शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

मुकुल की दीपावली

बाल कहानी

मुकुल की दीपावली

                                            पवित्रा अग्रवाल
              पापा के स्थानांतरण का समाचार सुन कर मुकुल उदास हो गया था। अब फिर एक नई जगह, नया स्कूल, नये साथी, नये शिक्षक। पता नहीं नई जगह उसका मन लगेगा या नहीं लेकिन जाना तो था ही। अभी वह पाँचवीं क्लास पास कर के चुका था। नये स्कूल में दाखिला लेते समय भी वह उत्साहित नहीं था। कक्षा में मुकुल के बराबर की सीट पर सुकेश बैठता था। धीरे-धीरे वह दोनों एक-दूसरे के घनिष्ठ मित्र बन गए और मुकुल की उदासी कहीं गुम होती चली गई।
              सुकेश के घर से स्कूल करीब एक किलोमीटर दूर था। वह पैदल ही स्कूल जाया करता था। रास्ते में मुकुल का घर पड़ता था। सुकेश मुकुल को उसके घर से लेते हुए साथ स्कूल जाता था। दोनों साथ ही लौटते थे। स्कूल में भी साथ ही खेलना, साथ ही खाना।
 दीपावली के चार-पाँच दिन पहले सुकेश ने मुकुल से कहा, "आज स्कूल से लौटते समय कुछ पटाखे, बम आदि लेते हुए घर चलेंगे...तुम्हें चाहिए तो तुम भी खरीद लेना।'
            पटाखों का नाम सुनते ही मुकुल की आँखों में चमक आ गई फिर एकाएक वह उदास हो गया और बोला- "मैं तुम्हारे साथ चलूँगा लेकिन पटाखे नहीं ख़रीदूँगा। हमारे घर दीपावली नहीं मनाई जाती।"
       "अरे दीपावली तो हम हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है। तुम्हारे यहाँ दीपावली क्यों नहीं मनाई जाती ?'
      "पहले हमारे घर में भी दीपावली मनाई जाती थी....करीब सात वर्ष पहले जब मैं चार वर्ष का था तब मेरी बहन की मृत्यु दीपावली के दिन हो गई थी। तब से हमारे घर में दीपावली नहीं मनाई जाती।'
      'अरे यह तो पुरानी बातें हैं इन को अब कौन मानता है,तुम्हारे घर में जरूर तुम्हारे दादा-दादी होंगे इसी लिए तुम्हारे यहाँ दीपावली को खोटा मान लिया गया है।'
         "हमारे दादा-दादी नहीं हैं और हमारे यहाँ इस त्योहार को खोटा भी नहीं माना जाता पर इस दिन मम्मी-पापा  बहुत उदास हो जाते हैं...हमारे एक ही बहन थी...उसकी याद आ जाती है फिर दीपावली मनाने का मन ही नहीं करता।'
      "क्या हुआ था तुम्हारी बहन को ?' सुकेश ने पूछा।
     "मेरी बहन के दिल  में छेद था। मुझ से वह दो वर्ष बड़ी थी। दीपावली के दिन अचानक उसकी तबियत खराब हो गई। दीपावली का दिन होने की वजह से डॉक्टर भी समय से नहीं मिल पाए। अस्पताल तक जाते-जाते रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो गई थी।"
        मुकुल को सांत्वना देते हुए सुकेश बोला, "यह तो सचमुच बहुत बुरा हुआ, वैसे भी एक बहन तो सब की होनी ही चाहिये ।घर की रौनक बहन से ही होती है... एक बात बताओ, तुम्हारा मन दीपावली मनाने को नहीं करता ?'
     "सच कहूँ सुकेश, दीपावली का न मनाया जाना तो मुझे बुरा नहीं लगता लेकिन अब पटाखे, बम, अनार जलाने को मेरा भी मन करने लगा है।'
 "कोई बात नहीं मुकुल, आज मैं भी पटाखे नहीं ख़रीदूँगा। अपन सीधे घर जाएँगे।'
 
        ज  दीपावली थी। सुकेश दोपहर को अचानक मुकुल के घर चला आया और मुकुल की
मम्मी से बोला - "आंटी, मैं मुकुल को अपने घर ले जाना चाहता हूँ। हम साथ-साथ दीपावली मनाएँगे, सुबह उसे वापस भेज दूँगा।'
      "लेकिन बेटे, हम ने बहुत दिन से दीपावली नहीं मनाई।'  आँखें पोंछते हुए मुकुल की मम्मी ने कहा।
     सुकेश कुछ कहता, उससे पहले ही मुकुल के पिताजी बोले - "हाँ रेखा यह सही है कि हमने बहुत दिन से दीपावली नहीं मनाई पर हमारे घर दीपावली मनाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है... तब मुकुल छोटा था और पटाखों से डरता था और हमारा दुख भी ताजा था  इसलिए दीपावली मनाने का मन नहीं करता था ....पर अब मुकुल बड़ा हो रहा है ,उसका मन भी पटाखे जलाने को करता होगा। यह उम्र हंसने-खेलने की है... मायूस होकर घर में बैठने की नहीं।..इस वर्ष से हम भी दीपावली मनाएँगे।'
     "ठीक है बेटे, तुम्हारे पापा ने इजाजत दे दी है तो कपड़े बदल कर चले जाओ लेकिन पटाखे छोड़ने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना। एक बाल्टी पानी पास में अवश्य रखना ताकि गलती से किसी के कपड़ों में  आग लग जाए तो बुझाई जा सके। लंबी स्टिक से पटाखे को आग लगाना। पटाखों के बंडल को पटाखे जलाने की जगह से दूर रखना....हो सके तो घर के बड़े सदस्यों की देख-रेख में बम, अनार, रॉकेट आदि जलाना।'
    मम्मी ने कुछ रुपये मुकुल को देते हुए कहा - "इन से तुम पटाखे खरीद लाना।'
       " मैं बाजार से मिठाई,दीये और पूजा का सामान लेने जा रहा हूँ...पटाखे खरीद कर तुम दोनों पहले यहाँ दीपावली मनाओ फिर दोस्तों के साथ मनाना।'
 "थैंक्यू मम्मी, थैंक्यू पापा' कहते हुए मुकुल के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गई और वह सुकेश के साथ पटाखे लेने चल पड़ा।

-पवित्रा अग्रवाल
'सृजन कुंज '    पत्रिका के मई -अगस्त 2017  में प्रकाशित              मेरा  साक्षात्कार 

           सामाजिक सरोकार से जुडी लेखिका पवित्रा अग्रवाल से
                 डॉ प्रीति प्रवीण खरे की बातचीत
 

-आप बाल साहित्य को किस तरह परिभाषित करना चाहेंगी?    
     जन्म के बाद बच्चा कुछ वर्ष तक परिवार के साथ बहुत सुरक्षित घेरे में रहता है ,पर धीरे धीरे उसे उस स्कूल के लिए घेरे से बाहर निकलना ही होता है नई स्थितियों से नए लोगों से उस का पाला पड़ता है उसे अच्छा  बुरा ,सही गलत का ज्ञान नहीं होता .उसे उसके लिए तैयार करना होता है .उस समय वह पढ़ना नहीं जानता ,उसे उसकी उम्र के अनुरूप छोटी छोटी कहानियां सुना कर आगे के लिए तैयार किया जाता है और मैं समझती हूँ कहानियों का जन्म भी शायद इसी लिए हुआ होगा . धीरे धीरे वह  क्रमश और बड़े समूह में जाने लगता है .
   मैं समझती हूँ कि  बाल साहित्य जो बच्चो में सूझ बूझ और जागरूकता पैदा करे , सही गलत का ज्ञान कराये,  अंधविश्वासों पर चोट करे .भूत प्रेत, अंध श्रद्धा से बचने की राह दिखाए ‘कुरीतियों से बचने की एक नई  द्रष्टि दे .बाल साहित्य सिर्फ बच्चों के लिए ही नहीं है वह माता पिता को भी राह दिखा सकता है .जब माता पिता रुढ़िवादी है ,अन्धविश्वासी है ,जादू टोनो में विश्वास करने वाले हों तो बच्चों पर उसका प्रभाव पड़ता है अतः बच्चो से पहले तो माता पिता में परिवर्तन की जरुरत होती है .
- बाल साहित्य लेखक/लेखिका को परकाया प्रवेश करना पड़ता है।आपने चुनौतिपूर्ण विधा बाल साहित्य को ही लेखन का माध्यम क्यों बनाया?


   पहली बात तो प्रीती जी मैं केवल बाल लेखिका नहीं हूँ .बाल लेखन की ही तरह मैं ने कहानियां  और लघुकथायें भी समान अधिकार से लिखी हैं .मेरे लेखन की शुरुआत कहानी से हुई थी .पहली कहानी ‘श्राद्ध’ 1974 में आगरा से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘निहारिका में प्रकाशित हुई थी .पहली बाल कहानी  जहान्वी में 1976में दूसरी ‘प्रेस ने चोर पकड़ा ‘1978 में पराग में प्रकाशित हुई थी …उन्ही दिनों कुछ मथुरा रेडियो  स्टेशन से भी प्रसारित हुई थी किन्तु  अब पता नहीं वह कौन सी थी और कहाँ है .
    मेरा जन्म  उत्तर प्रदेश में कासगंज (एटा ) में 1952 हुआ था .पूरी शिक्षा वहीँ हुई .शादी लखनऊ से हुई थी पर मेरे पति केन्द्रीय सेवा में हैदराबाद में थे . 1978 में मैं हैदराबाद आगई थी .उसके बाद  गृहस्थी की नई जिम्मेदारियों के बीच 12 साल तक मेरी कलम मौन रही ..उन दिनों हिंदी की मुख्य पत्रिकाए भी यहाँ  बड़ी मुश्किल से मिलती थीं .

पुनः लेखन कैसे प्रारम्भ हुआ ?

     1990 में मैं बहुत बीमार हुई थी ,एक तरह से नया जीवन मिला था पर जीवन कितना शेष है नहीं पता था .उस समय मेरा बेटा ग्यारह व बेटी पांच वर्ष की थी . हम दोनों का परिवार उत्तर प्रदेश में था .बच्चो के बारे में सोच सोच कर मन बहुत अशांत रहता था ...आसूं ही नहीं सूखते थे . तब मेरे पति लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने पुनः लेखन शुरू करने की सलाह दी...और मुझे भी यह सलाह अच्छी लगी और लेखनी चल निकली और चल ही रही हैं .इस दूसरी पारी में मैंने बाल कहानियां भी बहुत लिखीं पर मुझे यह विधा चुनौती पूर्ण कभी नहीं लगी. कभी एसा महसूस नहीं हुआ कि मुझे परकाया प्रवेश करना पड रहा है.बड़े सहज रूप से लिखा है . 
   - बाल साहित्य लेखन में कौन सी विधा(गद्य/पद्य/दोनों)आपको ज्यादा प्रभावित करती है और क्यों?
     
      बचपन से ही  कविताओं से ज्यादा कहानियों में  मेरा मन लगता था  शायद इसी लिए मेरी मूल विधा गद्य है , यों कुछ बाल कविताये लिखी थीं और वह प्रकाशित भी हुई थीं पर  कहानी मेरी मूल विधा है .
आप वरिष्ठ बाल साहित्यकार हैं।आपके अनुसार बाल साहित्य की भाषा -शैली कैसी होना चाहिए ?
    – मेरे विचार से बा.साहित्य आम भाषा में  बहुत सरल सहज और रोचक हो. पांडित्य  प्रदर्शन न हो . उपदेशात्मक न हो ,वार्तालाप के माध्यम से कहानी आगे बढे तो ज्यादा प्रभावी होती है और बोझिलता से बच जाती है . 
     बाल साहित्य लिखा तो बहुत जा रहा है,लेकिन बच्चों तक सुलभता से नही पहुंच पा रहा है।आपके अनुसार इसकी क्या वजह है?

      बहुत सही बात कही है .कभी कभी तो मुझे लगता है कि बाल साहित्य हम ही लिख रहे हैं और हम ही पढ़ रहे हैं . बच्चों द्वारा बहुत कम पढ़ा जा रहा है.अधिकतर बाल पत्रिकाओ में प्रतिक्रिया बच्चो की नहीं होती हम बड़े ही सराहते रहते हैं .
     बच्चो तक बाल साहित्य न पहुँच पाने का कारण हम माता पिता भी है जो मंहगे से मंहगे खिलोने बच्चों  को लाकर देते हैं किन्तु पत्रिका भी बच्चो को दी जा सकती है इस तरफ उनका ध्यान ही नहीं जाता .पढ़ने का संस्कार बचपन से ही देने की जरुरत है .बच्चा जब पढ़ना नहीं जानता तभी से  बाल पत्रिकाए घर में आनी चाहिए . वह रंग  बिरंगे चित्रों से आकर्षित होगा और उसे उलट पलट कर देखना चाहेगा यह उसका पहला कदम होगा जिसे गति देने की जरुरत है .मेरी पोती मानसी साढ़े पांच वर्ष की है .हम तो उसके साथ नहीं रह पाते पर मेरा  बेटा  उस कमी को फोन से पूरा करने का प्रयास करता था .जब वह ढाई साल की थी तो उसे फोन देकर कहता था दादी दादा से कहानी  सुनो. तब मुझे महसूस हुआ कि इतने छोटे बच्चो के लिए तो मैं ने कुछ लिखा ही नहीं है .कुछ मनगढ़ंत  कहानियां  उसे सुनाती थी पर कहानी सुनने की उसकी प्यास समाप्त ही नहीं होती थी
      .दूसरी बात जो मैं मन गढ़ंत कहानियां  उसे सुनाती थी वह उसके दिमाग में अंकित हो जाती थी ,कुछ दिन बाद  जब वह उसमे से कोई कहानी पुनः सुनने की फरमाइश करती थी तो मैं भूल चुकती थी कि  मैं ने क्या क्या कहा था  और वह मुझे बीच में टोक टोक कर याद  दिलाती थी कि दादी एसा नहीं एसा हुआ था . इस दौरान उसे सुनाने के चक्कर में उस उम्र के बच्चों के लिए भी कुछ कहानियों का निर्माण हुआ.
     स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए( जो खुद पढ़ सकते हों ) पुस्तकालय का उपयोग करने की छूट होनी चाहिए और इसके लिए उन्हें प्रोत्साहित भी करना चाहिए ... वहाँ  बाल पत्रिकाए और बाल साहित्य प्रचुर मात्रा  होना चाहिए .बल्कि मेरा मानना तो यह है कि कक्षा  में सप्ताह में एक दो पीरिएड एसे होने चाहिए कि कोई प्रेरणात्मक कहानी एक बच्चा पढ़े और दूसरे बच्चे सुनें . माता पिता और विद्यालय की उदासीनता से बच्चों तक बाल साहित्य नहीं पहुँच पा रहा है  .
  
बाल साहित्य में चित्रों का क्या महत्व है?

     बाल साहित्य में एक उम्र विशेष तक तो चित्रों का बहुत महत्व है. जब बच्चे पढ़ना नहीं जानते तब वह रंग बिरंगे चित्रों के माध्यम से ही आकर्षित होते हैं और बड़ों से कहते हैं यह कहानी सुनाओ .मेरी पोती मानसी को भी अभी पढ़ना नहीं आता पर वह चित्रों के आधार पर तय करती है कि उसे कौन सी कहानी सुननी है .
     -एक बाल साहित्य लेखक को किन-किन बिंदुओं का विशेष ध्यान रखना चाहिए?
    वैसे मैंने तो कोई बिदु विशेष को ध्यान में रख कर कुछ नहीं लिखा
पर एक जागरूक माँ  की तरह घर बाहर मेरी नज़रें जब जब कुछ खतरों पर पड़ती हैं जैसे बिना स्टॉप के बीच सड़क पर बस से उतरते बच्चे, ऑटो में भेड़ बकरियों की तरह भरे हुए बच्चे ,पतंग उड़ाने और लूटने के चक्कर में सुध बुध खो  कर पतंग के पीछे भागते बच्चे आदि इस तरह की सेंकडों बातों पर ध्यान जाता है तो मेरी कहानी बन जाती है.
    मैं  समझती हूँ उसमे तार्किकता होनी चाहिए , आज का बच्चा बहुत होशियार है .वह कहानी सुन ने के साथ तर्क करता है कि एसा क्यों हुआ...यदि एसा नहीं होता तो क्या  होता आदि

  
  - आपने बाल साहित्य को समृद्ध किया है।बाल साहित्य की दशा और दिशा पर प्रकाश डालने की कृपा करें ?

     – बाल साहित्य बहुत लिखा जा रहा है.समय की मांग के अनुसार नए नए विषयों पर भी लिखा जा रहा  पर उसकी दशा अच्छी इस लिए नहीं है कि वह बच्चो तक नहीं पहुँच पा रहा है .वैसे इधर ‘अभिनव बालमन ‘ और ‘बाल प्रहरी’ द्वारा  जगह जगह बाल कार्य शालाये चलाने के विषय में पढा है भोपाल में ‘अपना बचपन ‘ के संपादक महेश सक्सेना जी भी अपने केंद्र के माध्यम से बच्चो को बढ़ावा दे रहे हैं ,राज कुमार राजन ने भी इधर कदम बढाए हैं .बच्चो का देश के संपादक भी काम कर रहे हैं ...और बहुत जगह भी हो रहे होंगे ,यह साहित्य से बच्चों को जोड़ने का अच्छा प्रयास है . 

  
  -बाल साहित्य में मल्टीमीडिया के सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलुओं को आप किस तरह रेखांकित करेंगी ?

       इसके दोनों तरह के प्रभाव बच्चों पर पड़ते हैं. यह उनके माहोल पर व ग्रहण करने की क्षमता पर  निर्भर करता है कि वह किस तरह ग्रहण करे .जैसे  बच्चों ने एक  फिल्म देखी  उसमे चोरी करने वाले बच्चे को सजा मिलती है उसे बच्चे दो तरह से देखते हैं एक ने सीखा चोरी बहुत बुरी चीज है इसे करने वालों को सजा मिलती है .एक ने सोचा चोरी करते समय उसने यह गलती न की होती तो वह पकड़ा नही जाता .
     मेरी एक  परिचित लड़की आगरा से शादी हो कर यहाँ आई है. वह बता रही थी कि उसने अपनी 8-10 साल की भतीजी से हैदराबाद चलने को कहा तो वह तैयार नहीं हुई . उसने पूछा तुम्हे बुआ पर विश्वास नहीं है ? उस बच्ची ने कहा “आप सावधान इंडिया नहीं देखतीं क्या ? ...आजकल तो माँ बाप पर ही विश्वास नहीं होता ‘आप तो बुआ हैं ’
    मल्टी मिडिया की वजह से बच्चो के ज्ञान का क्षेत्र बहुत विकसित हुआ है.आज के बच्चे बहुत होशियार हैं पर अति हर चीज  की बुरी होती है.उन पर नजर रखनी होगी और समय सीमा भी तय करनी होगी .
        आपके मतानुसार बाल साहित्य लेखक से क्या अपेक्षाएं हैं?

      बाल साहित्य उद्देश्य पूर्ण , बच्चों  में सूझबूझ  व जागरूकता पैदा करने वाला होना चाहिए .अंधविश्वासों ,जादू टोनों , आधारहीन कुरीतियों से तर्क के साथ छुटकारा दिलाने वाला होना चाहिए और आज के  बच्चों पर तो पहले से ज्यादा तरह तरह के खतरे  मडरा रहे हैं उन पर लेखक को कलम चलानी होगी .वैसे वे लिख भी रहे हैं  पर वे उपदेशात्मक नहीं होना चाहिए  .
 
      बाल साहित्य विधा गद्य एवं पद्य लेखक/लेखिका में आप किससे अत्यधिक प्रभावित हैंऔर क्यों?

      किसी लेखक विशेष का नाम तो मैं नहीं ले पाऊंगी क्यों कि नए पुराने  बहुत से लेखक बहुत अच्छा लिख रहे हैं पर हम सभी की कुछ कहानियां बहुत अच्छी होती हैं व कुछ साधारण भी .पर जो भी तार्किकता के आधार पर बच्चे को संतुष्ट कर सके, भाग्यवादी न बनाते हों . कुप्रथाओं का विरोध करते हों और समय के हिसाब से बदल रहे बच्चों की नई  समस्याओं पर कलम चला रहे हों ,मुझे वह अच्छे लगते हैं  .  बचपन में मुझे भूत प्रेत ,राक्षसों , परियों वाली कपोल कल्पित  कहानियां जिन्हें तर्क द्वारा न समझा जा सके पसंद नहीं आती थीं .लेखक रूप में भी इन  विषयों पर मेरी कलम नहीं चली .

    
  बाल साहित्य की कौन-कौन सी पत्रिकाएं आप बार-बार पढ़ना चाहेंगी ?

     बाल साहित्य की बहुत से पत्रिकाए प्रकाशित हो रही है बाल भारती ,बालवाणी ,देवपुत्र ,नंदन ,बाल वाटिका ,बालहंस ,बच्चों का देश,सुमन सौरभ .चम्पक, बाल प्रहरी ,बाल अभिनव आदि सब की अपनी अलग विशेषताएं है मै तो इन्हें पढ़ना चाहूगी ही पर इन्हें बच्चे  पढ़े यह हमारा लक्ष्य होना चाहिए  .मेरे पास जो भी बाल पत्रिकाए आती हैं मेरा प्रयास रहता है कि वह बच्चों को दे दूं .

     आपके लेखन की पसंदीदा विधा क्या है।आपकी अब तक प्रकाशित रचनाओं में कौन- कौन सी रचनाएं हैं?

       मेरी पसंदीदा विधा कहानी है (बाल कहानी ,कहानी और लघु कथाये ) मेरी अब तक 6 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं .उनमे दो कहानी संग्रह ,एक लघु कथा संग्रह, दो बाल कहानी संग्रह हैं. एक बाल कहानी संग्रह का तेलगू भाषा में अनुवाद हुआ है .

     एक लेखक/लेखिका की सभी रचनाएं प्रिय होती हैं।आपकी भी होंगी।उनमें से अति प्रिय रचना कौन सी है  और क्यों ?

   करीब 150 बाल कहानियां मैं ने लिखी हैं .मेरी अधिकतर कहानियां किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चों के लिए हैं.अति प्रिय रचना बताना मुश्किल तो है .
     मुझे अपनी एक कहानी ‘हुक्का गुड़गुड़ाने का चस्का’ बहुत पसंद है.आज शहरों में हुक्का सेंटर बहुत खुल रहे हैं जो कम उम्र के बच्चों को नशे का आदी बना रहे हैं .बच्चो को सही  जानकारी तो होती नहीं है वह तो बस दोस्तों के साथ  फन के लिए वहां चले जाते हैं और इस जाल में फंस जाते हैं.  सर्व प्रथम यह कहानी एक पत्रिका द्वारा  रचना के आग्रह पर उन्हें दी थी .पर सम्पादक जी को लगा कि इस तरह का ज्ञान बच्चों को क्यों दिया जाए ....बाद में यह कहानी ‘बाल भारती’ में प्रकाशित हुई थी
.

    -मुझे विदित है कि आपको मिले सम्मानों की लम्बी सूचि है।कृपया विशिष्ट सम्मानों का उल्लेख कर दीजिए?

     अधिकतर सम्मान पुस्तकों पर मिलते हैं. मैं करीब 40-42वर्षों से लिख व छप रही हूँ पर मेरा पहला बाल कहानी संग्रह 2010 में और दूसरा 2012 में आया और 4-5 अभी आने हैं  .दोनों में 25-25 कहानियां हैं.
    मेरे पहले संग्रह ‘फूलों से प्यार’ को 2012 का द्वितीय भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार ( प्रकाशन विभाग दिल्ली )मिला था .
   इसी पुस्तक पर ‘ राज कुमार राजन फाउंडेशन द्वारा 2014 का पं.सोहन लाल द्विवेदी बाल साहित्यकार पुरस्कार  मिला  .बाल कल्याण और शोध केंद्र भोपाल और म.प्र.तुलसी साहित्य अकादमी द्वारा भी. 
     कुछ  समाचार मुझे पता नही चल पाते .कुछ में दूरी की वजह से चाहते हुए भी ऐसे बाल साहित्य  सम्मेलनों में नहीं  जा पाती . 
    
 -आप अपने लेखन के द्वारा समाज को क्या संदेश देना चाहती हैं?

   मेरा पूरा लेखन सामाजिक सरोकार से जुड़ा है और उद्देश्यपूर्ण है कुछ लिखने के   लिए मैं ने सप्रयास कभी कुछ नहीं लिखा .व्यर्थ के सामाजिक ,धार्मिक आडम्बरों में मेरा विश्वास कभी नहीं रहा .मैं कर्म में विश्वास करती हूँ.पूजा पाठ ,पंडितों द्वारा समस्याओं से छुटकारा दिलाने वाले कर्म कांडों ,ज्योतिशियों , शुभ महूरत आदि में मेरा बिलकुल विश्वास नहीं है . मैं जो हूँ वह मेरी रचनाओं में झलकता है और वही मेरा सन्देश है .


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मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

विकलांगता का दुःख

बाल कहानी
         विकलांगता का दुःख
                                                              
                                                    पवित्रा अग्रवाल
 
        मदन ने जब आँखें खोलीं तो सामने पिता, माँ व दादी खड़े थे। उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई तो जगह  अनजानी लगी।
  "माँ मैं कहाँ हूँ ?'
  "बेटे, तुम अस्पताल में हो। कल स्कूल जाते समय तुम्हारी कार का एक्सीडेंट हो गया था।'
  "मेरी आँख पर यह पट्टी क्यों है ? हाथ पर भी प्लास्टर है। क्या हाथ की हड्डी टूट गई है ?'
  "हाँ बेटे, तुम्हारे हाथ की हड्डी टूट गई है। एक आँख में भी चोट लगी है।'
    आँख में चोट लगने की बात सुन कर मदन घबरा गया, "आँख में चोट ? माँ कहीं ऐसा तो नहीं कि इस एक आँख से अब मैं देख ही न पाऊँ ?'
  "ऐसा कुछ नहीं होगा। तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगे ।'
 मदन आँखें बंद करके लेट गया। उसे बहुत सी बातें याद आ रही थीं। पिछले वर्ष कक्षा में सोनू के  प्रथम आने पर उसने अपने मित्र अमित से कहा था, "यार, इस बार तो लँगड़े सोनू ने बाजी मार ली।'
    अमित को उसकी बात पसंद नहीं आई थी। उसने कहा था, "मदन, क्या तू खाली सोनू नहीं कह सकता। नाम से पहले लँगड़ा या ऐसा कोई भी विशेषण लगाना जरूरी है ? शर्म की बात है हमारे लिए कि शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के बाद भी पढ़ाई में उससे पीछे हैं।'
         "लँगड़ा है, इसीलिए तो प्रथम आ गया। न तो वह खेल सकता है और न कहीं ज्यादा आ जा सकता है। खाली बैठा क्या करे ... पढ़ता रहता होगा।...ज्यादा पढ़ेगा तो प्रथम तो आएगा ही।'
    अमित ने कहा, "मदन, ये सब फालतू के तर्क हैं। पता नहीं दूसरों की कमियाँ ढूँढ़ने में तुझे क्या मजा आता है। हमें दूसरों की अच्छाई देखनी चाहिए। दिलीप के हाथ में छह उँगली हैं तो तू उसे छंगा कहता है। मोहन को हकला कहता है। सुरेश को मोटा होने की वजह से हाथी कहता है। यह अच्छी बात नहीं है। शारीरिक दोष तो किसी में कभी भी आ सकता है।एक दुर्घटना में सोनू की टाँग कट गई थी तो वह लँगड़ा कर चलता है। तू किसी की शारीरिक कमी का मजाक उड़ाना छोड़ दे।'
        ये बातें याद करके मदन रोने लगा था । उसे लगा कि वह अब एक आँख से देख नहीं पाएगा।
        माँ-पापा यहाँ तक कि डॉक्टर ने भी उसे विश्वास दिलाया था कि वह ठीक हो जाएगा।
 लेकिन कुछ भी ठीक नहीं हुआ था। आँख में कार का शीशा चुभ गया था। डॉक्टर उसकी आँख नहीं बचा पाए। उसे एक कृत्रिम आँख लगा दी गई थी। वह अपने कमरे में बैठा रहता। सोचता रहता था कि नकली आँख देख कर बच्चे उसका मजाक उड़ाएँगे।
           माता-पिता ने उसे बहुत समझाया  लेकिन स्कूल भेजने में सफल नहीं हुए फिर अमित ने ही मदन को समझाया था और कहा था, "यह तुम्हारा भ्रम है। कोई मजाक नहीं उड़ाएगा। नवाब पटौदी की भी एक आँख दुर्घटना में खराब हो गई थी। उनकी भी कृत्रिम आँख लगी है। उसके बाद भी वह विज्ञापनों में काम कर रहे हैं और जहाँ तक मुझे याद पड़ता है बाद में भी वह क्रिकेट खेले हैं। उनकी योग्यता के सामने शारीरिक दोष छिप गया। तुम भी इस दुर्घटना को भूल जाओ और मेरे साथ स्कूल चलो। सब तुम्हें बहुत याद करते हैं।'
       दुर्घटना के बहुत दिन बाद आज वह स्कूल गया था। शिक्षक व कक्षा के सभी छात्रों ने बड़े प्यार से उसका स्वागत किया था। सोनू भी हमेशा की तरह उससे बड़ी गर्मजोशी से मिला था लेकिन मदन सोनू से नजर नहीं मिला पा रहा था। वह स्वयं को शर्मिंदा महसूस कर रहा था। विकलांगता का दुख उसकी समझ में आ गया था। अब उसे दूसरे की तकलीफों का एहसास होने लगा था। बिना कुछ कहे उसने सोनू को गले से लगा लिया। दोनों की आँखों में आँसू थे।.
       

Email ---agarwalpavitra78@gmail.com
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शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

गणेश चन्दा

बाल कहानी 
                       
गणेश चन्दा
                         
 पवित्रा  अग्रवाल

 "सोनम दरवाजे पर कौन था ?'
 " माँ गणेश का चन्दा मांगने के लिए चार पाँच लड़कों का ग्रुप आया  है।'
 " अरे हाँ अब गणेश चतुर्थी आ रही है यानि गणेश बैठाने के दिन, अब बच्चें दरवाजे की घन्टी बजा बजा कर परेशान करते रहेंगे ।'
  "आप कल जब घर पर नहीं थीं तब भी,तीन चार ग्रुप चन्दा माँगने आए थे।'
 "फिर तूने उन्हें चन्दा दिया ?"'
 "नहीं मम्मी आप घर पर नहीं थी ,मैं किसी को जानती नहीं  ... मैं ने तो दरवाजा भी नहीं खोला।'
 "अच्छा किया ।...हर गली,नुक्कड़ मे तीन चार गणेश बैठाते हैं। इस तरह अपने घर के आसपास कम से कम  छह- सात गणेश  लगेंगे । कुछ साल पहले एक बड़ा सा गणेश लगता था, सब वहीं पूजा कर लेते थे पर अब हर कोई अपने घर के सामने गणेश लगाने को तैयार बैठा है और हर किसी को चन्दा चाहिए। '
 "हाँ माँ अपने अपने गणेश अलग बैठाने का शौक है तो बैठाए, पर सब से चन्दा क्यों माँगते फिरते हैं ?...'
  "माँ वह लोग दरवाजे पर खड़े हैं,पहले उनसे बात करलो ।'
 "ठीक है अभी बात करती हूँ - " क्या बात है बच्चों, क्यों बैल बजा रहे हो ?'
 "आन्टी गणेश का चन्दा लेने आए हैं।'
 'अपने एरिये में बहुत वर्षो से इतना बड़ा गणेश लगता है, वह पूजा करने के लिए बस नहीं होता ?'
 "वहाँ बहुत भीड़ हो जाती है आन्टी फिर हम तो अपने घर के बाहर छोटा सा गणेश लगाते हैं,अच्छी तरह पूजा करने को भी मिल जाती है।'
 "क्या तुम लोग स्कूल नहीं जाते हो ?'
" जाते हैं न आन्टी, मैं नौ क्लास में पढ़ता हूँ, यह सब भी ऐसे ही अलग अलग कक्षाओं में पढ़ते हैं'
 "जो समय तुम इस काम में व्यर्थ  कर रहे हो वह समय तुम्हें अच्छे से पढ़ने लिखने में लगाना चाहिए।'
 "आन्टी गणेश इसी लिए तो बैठा रहे हैं ताकि अच्छे से पूजा कर सकें और वह हमें आशीर्वाद दें।'
 "यदि तुम बड़े गणेश की पूजा करोगे  या किसी दूसरे गणेश मंदिर में जा कर पूजा करोगे तो क्या भगवान तुम्हें आशीर्वाद नहीं देंगे ?'
 "देंगे पर इस से ज्यादा खुश होंगे , प्लीज आन्टी दीजिए न यह तो धर्म का काम है ।'
 "हाँ बेटा धर्म का काम है और हम हर वर्ष बड़े गणेश को बड़ा चन्दा देते हैं और पूजा करने के लिए एक  गणेश बहुत हैं, तुम लोगों को भी उन्हीं की पूजा करनी चाहिए ...हम ज्यादा गणेश बैठाने के पक्ष में नहीं हैं । '
 "पर क्यों आन्टी ?'
 "हाँ बच्चों इस विषय में तुम्हें मैं जरूर बताना चाहूँगी। गणेश प्रतिमाए क्या मुफ्त में मिलती है ?।
 "आन्टी मुफ्त में मिलतीं तो हम चन्दा क्यों माँगते,बहुत मंहगी मिलती हैं और बड़े गणेश तो सुना हैं साइज के हिसाब  से पचास साठ हजार तक आते हैं ?'
 "बेटा एक बात बताओ ...अपने शहर में कितने गणेश बिठाए जाते होंगे ? '                
 "कम से कम सात हजार ..और हर वर्ष इनकी संख्या बढ़ती जा रही है।'
  "यानि करोड़ों रुपए के गणेश लिए जाते हैं और  कुछ दिन पूजा के बाद उनको नदी ,तालाबों में डाल कर जल को प्रदूषित किया जाता है ... और यह हिसाब तो एक शहर का है, पूरे देश में कितना धन इस पर खर्च होता होगा ? और यह तो सिर्फ प्रतिमाओं की कीमत है...बाकी सब अलग ..बेटा तुम बताओ आज कितने बच्चें धन के अभाव में स्कूल नहीं जा पाते, ऊँची पढाई नहीं कर पाते ।'
 "हाँ आन्टी बहुत से तो पढ़ाई की उम्र तक ही नहीं पहुँच पाते... उस से पहले ही भूख और बीमारी के
शिकार हो कर मर जाते हैं।'
 " बेटा मैं बस तुम लोगों को यही बताना चाह रही थी ...यह पैसा सही जगह लगे तो कितनों का भला हो सकता है।'
 "पर आन्टी एक दो के न लगाने से क्या फर्क पड़ना है ?'
      "बेटा लोगों को जागरूक करना पड़ेगा।हम जैसे लोग चन्दा माँगने वालों को चन्दा न देकर उन्हें न देने की वजह बताऐ। मीडिया समाचार पत्रों व टी वी चैनलों के माघ्यम से इस तरह के संदेश  प्रसारित हों तो धीरे धीरे ही सही जरूर जागृति आएगी ।'
 "हाँ आन्टी हम ने इस तरह से कभी सोचा ही नहीं और किसी ने इस तरह से हमें समझाया भी नहीं ।'
 "हाँ आन्टी अब बात हमारी समझ में आ गई है। हम अब से बड़े गणेश की ही पूजा करेंगे और दूसरे लोगो को भी समझाने की कोशिश करेंगे ।'
 "थैंक्यू आन्टी हमारा मार्गदर्शन करने के लिए ।'              



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बुधवार, 9 अगस्त 2017

पानी के बताशे

बाल कहानी
                        पानी के बताशे
       
                                                   पवित्रा अग्रवाल


      ट्यूशन पढ़ कर लौटते हुए शालिनी की नजर चाट के ठेले पर पड़ी। गोल गप्पे देख कर उस के मुंह में पानी भर आया।उसने अपनी सहेली से कहा -- "रोहिणी देख सामने की बंडी पर पानी के बताशे मिल रहे हैं ।''
  "तुम इन्हें पानी के बताशे बोलती हो, हम इन्हें गोल गप्पे कहते हैं।''
     "हाँ कुछ लोग पानी पुड़ी भी बोलते हैं पर यार है बड़े मजे की चीज।इन्हें देख कर तो मेरे मुंह में पानी   आ रहा है,चल खाते हैं।''
  "नहीं शालिनी मैं बाहर के गोल गप्पे कभी नहीं खाती ।मेरी मम्मी ने कभी खाने ही नहीं दिए। सब से   ज्यादा इंफैक्शन की जड़ हैं ये ।''
     "वो कैसे ?''
  "देख शालिनी आज कल पीने का पानी कितना गंदा आ रहा है।अपने घरों में एक्वागार्ड या इसी तरह की पानी साफ करने की कोई न कोई मशीन लगी है।... पर इनके पानी का कोई भरोसा नहीं है।''
 " हाँ सो तो है।''
 " देख जिन हाथों से ये रुपए पैसे लेते हैं, उन्ही हाथों से यह चाट बना रहे हैं...इन्ही से घड़े में हाथ डुबो कर बताशों में पानी भर भर कर लोगों कों खिलाते भी जा रहे हैं।इस तरह हाथ की सारी गंदगी उस   पानी में घुलती जाती है।''
  "हाँ रोहिणी बात तो तूने बिलकुल सच कही है पर यह रूपए पैसे वाली बात मेरी समझ में नहीं आई।''
 "ये रुपए पैसे सैंकड़ों लोगों के हाथ से गुजरते हैं।जैसे हम खाँसते या छींकते समय मुंह पर हाथ रखते  हैं, हाथ गंदे हो गए न,सफाई कर्मचारी कचरा उठा रहा है किसी ने रूपए दिए तो उन्हीं हाथों से ले कर उसने जेब में रख लिए ... कहने मतलब यह है कि  रूपए पैसे लेते देते समय हाथों की गंदगी रुपयों में लगती रहती है और रुपयों की यात्रा जारी रहती है । ''   
  "ओ हाँ रोहिणी रुपए पैसे तो वाकई गंदे होते हैं। यह गंदगी भी हाथों द्वारा पानी में घुल जाती होगी । छी, अब तो मैं बाहर पानी के बताशे कभी भी नहीं खाऊंगी।...पर ये मुझे बहुत पसंद हैं तुझे अच्छे नहीं  लगते ?'
     "अच्छे क्यों नहीं लगते शालिनी, मुझे भी बहुत पसंद हैं ।मैं खाती भी हूँ पर घर पर ।...आजकल तो बाजार में गोल गप्पों का पैकेट मिलता है,पापा वही ले आते हैं।मम्मी आलू ओर मटरा उबाल लेती हैं और पानी भी घर में ही बना लेती हैं ।इस तरह हम लोग तो अक्सर घर में खाते ही रहते हैं ।''
  "पर बाहर का पानी बहुत मजेदार होता है ,वैसा घर में नहीं बन पाता होगा ।''
  " "घर में भी अच्छा बन जाता है,मम्मी तो धनियां ,पोधीना जाने क्या क्या डाल कर बनाती हैं,सब मसालों  का खेल है। वैसे बाजार में पानी पुड़ी मसाले का पैकेट भी आता है।...पर सब से खास बात शालिनी  यह है कि स्वाद के चक्कर में हम स्वास्थ्य से खिलवाड़ तो नहीं कर सकते न ।''
  "बिलकुल ठीक कहा तूने रोहिणी ,स्वास्थ्य से खिलवाड़ का मतलब है ...डाक्टर्स के चक्कर लगाओ, दवाएं खाओ।... मतलब समय व धन दोनो की बरबादी।''
  "देख शालिनी सामने की दुकान पर गोल गप्पों का पैकेट मिल रहा है।चल लेते हैं साथ ही इसके मसाले का पैकेट भी ले लेंगे ।''
 "पर पानी कौन बनाएगा ?''
 "शालिनी,पहले मेरे घर चल मम्मी से पानी  बनवा लेंगे,तू भी देख लेना कैसे बनता है।..हमारी फ्रिज में हमेशा कुछ उबले आलू जरूर रहते हैं।...अब तू गोल गप्पे खा कर ही जाना और हाँ हमारे घर से अपनी मम्मी को फोन कर देना...वरना वह चिन्ता करेंगी।''
   "अरे मेरे मुंह में तो फिर पानी आने लगा '' दोनो हँसती हैं
      

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सोमवार, 10 जुलाई 2017

नया विश्वास

बाल कहानी 
                       नया विश्वास
                              
              


                                             पवित्रा अग्रवाल

   रजनी आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। कक्षा में वह प्रथम तो कभी नहीं आई किन्तु हमेशा प्रथम दस में रहती थी। नृत्य, नाटक, डिवेट आदि में हमेशा भाग लेती थी और पुरस्कार भी पाती थी। नृत्य का प्रशिक्षण तो वह तीन-चार वर्ष की उम्र से ले रही थी। कत्थक नृत्य में वह प्रवीण हो चुकी थी। नृत्य के कई स्टेज प्रोग्राम दे चुकी थी। पढ़ने में उसकी रुचि  थी।  वह स्नातक की डिग्री तो लेना चाहती थी किन्तु नृत्य व अभिनय को अपना कैरियर बनाना चाहती थी। उसका बाल मन भविष्य के सपने देखने लगा था।
  एक दिन पैदल स्कूल जा रही थी । सड़क पार करते समय वह एक बस से टकरा गई। बस का पहिया उसके पैर पर से उतर गया था। घुटने से नीचे का एक पैर डॉक्टर को काटना पड़ा था।....इस दुर्घटना में उसकी टाँग ही नहीं गई बल्कि सब सपने भी टूट कर बिखर गए थे। माता-पिता के बहुत समझाने पर भी वह स्कूल नहीं जा रही थी। उसने अपने घुँघरू उठा कर खिड़की से बाहर फेंक दिये थे। दिन भर अपने कमरे में उदास सी बैठी रहती थी। स्वभाव से चिड़चिड़ी हो गई थी ।
 उन्हीं दिनों उसके शहर में फिल्मी सितारों का एक ग्रुप आया था जो नृत्य का स्टेज प्रोग्राम देने वाला था। माता-पिता जिद्द करके रजनी को भी उस प्रोग्राम में ले गए।
 एक नृत्यांगना को देख कर वह चहकी- "मम्मी ये तो सुधा चन्द्रन है। ये टी.वी. के बहुत से सीरियल्स में काम कर रही है।'
 पापा ने कहा, "तुम ने सही पहचाना, ये सुधा चन्द्रन ही है। तुम्हें इनका नृत्य कैसा लगा ?'
 "बहुत अच्छा लगा पापा' कह कर वह फिर उदास हो गई। उसे नृत्यांगना व अभिनेत्री बनने का अपना सपना फिर याद आ गया था। उसकी आँखें भर आई। उसके सपने मात्र स्वप्न बन कर ही रह गए थे जो अब कभी पूरे नहीं हो पाएँगे। वह अपाहिज की जिन्दगी जीते हुए यों ही एक दिन दुनिया से चली जाएगी।
 तभी उसे माँ का स्वर सुनाई दिया-- "रजनी क्या सुधा की तरह तुम नृत्य नहीं कर सकती ?'
 रजनी ने लाचारी से एक बार अपनी टाँग को देखा फिर कहा, "मम्मी आप जानती हैं मैं कभी नृत्य नहीं कर सकती फिर भी आप यह प्रश्न पूछ कर क्या मेरा मजाक उड़ा रही हैं ?'
 "कैसी बातें करती हो रजनी ... मैं माँ होकर तुम्हारा मजाक उड़ाऊँगी ? शायद तुम्हे पता नहीं कि इस नृत्यांगना सुधा की भी एक टाँग दुर्घटना में कट गई थी। यह नकली पैर से नृत्य कर रही है यदि यह नृत्य व अभिनय कर सकती है तो तुम क्यों नहीं कर सकती ?'
     ये आप क्या कह रही है माँ, मुझे विश्वास नहीं होता। बचपन में मैंने एक फिल्म देखी थी उसमें फिल्म की हीरोइन ने नकली पैर से नृत्य किया था....लेकिन वह तो फिल्मों की बातें है।.....वास्तविक जीवन में ये सब कहाँ हो पाता है।"
 "अरे उसकी हीरोइन यही सुधा तो थी। उस फिल्म का नाम था " नाचे मयूरी'...वह फिल्म सुधा के वास्तविक जीवन पर ही बनी थी।....'
 "सच माँ... मुझे ये नहीं मालूम था। ये फिल्म मुझे फिर से दिखाना।...पापा मैं सुधा चन्द्रन से मिलना चाहती हूँ।'
     "ठीक है बेटा मैं उनसे बात करके तुझे मिलवाने की व्यवस्था करता हूँ।'
 प्रोग्राम के बाद में रजनी सुधा के साथ थी।
 सुधा ने संक्षेप में रजनी को अपनी आत्मकथा सुनाई कि किस  तरह   वह भी निराश हो गई थी। उसके माता-पिता ने जयपुर ले जाकर  नकली पैर लगवाया था। धीरे-धीरे डाँस की प्रैक्टिस प्रारंभ की।...इस बीच कई बार निराशाओं ने घेरा। अंत में मैं ने अपंगता पर विजय पा ली है यह तो तुमने देख ही लिया है।...रजनी तुम भी निराश मत हो, हिम्मत से काम लो। इच्छा शक्ति को दृढ़ करो। हीनता की भावना को अपने पास भी मत फटकने दो। अपना एक लक्ष्य निर्धारित करो फिर उस दिशा में प्रयास प्रारंभ कर दो सफलता जरूर मिलेगी।'
  " आपसे मिलकर मुझ में एक नए विश्वास ने जन्म लिया है। अब मैं जीवन से उतनी निराश नहीं हूँ।'
 रजनी ने पुन: स्कूल जाने का निर्णय कर लिया। जल्दी ही वह पापा-मम्मी के साथ कृत्रिम पैर लगवाने जयपुर जाएगी। उसने निश्चय कर लिया है कि वह भी जीवन में कुछ पाकर  रहेगी

  email -- agarwalpavitra78@gmail.com 

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गुरुवार, 8 जून 2017

लगाम जरुरी



बाल कहानी                      
                    लगाम  जरूरी

                                                         पवित्रा अग्रवाल

     कालेज में कक्षाएं शुरू हो चुकी थीं। अपने प्रिय मित्र संयम को न देख कर प्राण और हीमेश को कुछ चिन्ता होने लगी ।
  प्राण ने कहा -- "परीक्षाओ के दिन हैं ,इन दिनों तो सब बच्चों पर तैयारी का भूत सवार रहता है पर संयम क्यों नहीं आया ।...किसी से पता करना होगा ।'
 "संयम राहुल के घर के पास  ही रहता है। यह क्लास समाप्त होने पर राहुल के पास चल कर पूछते हैं।'
      " हाँ याद आया ,दोनो एक ही अपार्टमेंन्ट में रहते हैं , शायद उसको कुछ जानकारी हो ।'
शिक्षक के जाते ही प्राण और हीमेश कक्षा से बाहर आए तो राहुल सामने ही खड़ा मिल गया।
 "राहुल आज संयम कालेज क्यों नहीं आया ?'
   "तुम्हें नहीं पता ?...  संयम के बहुत चोट आई है, इस समय वह अस्पताल में है।'
 "उसे चोट कैसे लगी ,कहीं गिर गया था क्या ?'
 "अरे नहीं, वह रात को अपने किसी दोस्त के यहाँ से बाइक पर लौट रहा था, सामने से आती किसी कार से टक्कर  हो गई थी, तो वह गिर पड़ा... सब से अधिक चोट सिर में लगी है...अभी वह बेहोश है और उसकी हालत चिन्ताजनक है।'
 "बाइक पर वह अकेला था ? '
 "नहीं साथ में उसका कजिन भी था ।'
 "उसको चोट नहीं आई ?'
 "वह बच गया , पर उसके हाथ की  हड्डी टूटी है ।'
 "निश्चित रूप से उसने हैलमेट नहीं लगा रखा होगा ।'
 "हाँ तुम्हारा अनुमान बिलकुल सही है ....डाक्टर्स भी यही कह रहे थे कि यदि उसने हैलमेट लगा रखा होता तो वह सिर की चोट से बच सकता था। पुलिस भी आ गई थी...संयम के पास लाइसेंन्स भी नहीं था।'
 "हमारे बराबर का ही तो है, इस उम्र में लाइसेंन्स बन ही नहीं सकता। उसके बाइक लेने के बाद मैं ने भी घर में जिद्द की थी कि मुझे भी बाइक दिला दो...पर मम्मी पापा ने सख्ती से मना कर दिया ।...बोले अभी तुम्हें अठारह साल का होने में एक वर्ष है, उस से पहले तुम्हें न तो लाइसेन्स मिलेगा और ना बाइक ।'
...मैं ने  उन्हें बताया कि हमारे साथ के कई लड़के बाइक पर आते हैं और उनके पास लाइसेन्स भी है।'
   पापा ने कहा - "उन लोगों ने उम्र गलत बता कर लाइसेंन्स ले लिया होगा...जो कि सही नहीं है।पापा बड़बड़ाए थे कि पता नहीं कैसे माँ बाप हैं जो बच्चों की गलत जिद्द को पूरा करने के लिए इस तरह झूठ का सहारा लेते हैं...
  मम्मी ने भी पापा की बात को सही ठहराते हुए कहा था - " बच्चों को झूठ और बेइमानी का पाठ तो वही पढ़ा रहे हैं।'
 "हाँ तुम्हारे मम्मी पापा ने ठीक कहा था।...मैं तो अठारह का हो चुका हूँ ...मेरे पास लाइसेंन्स भी है और घर पर बाइक भी।... फिर भी मुझे कालेज बाइक से आने की छूट नहीं है ।कभी बाइक से जाता भी हूँ तो हैलमेंट लगाने की शर्त पर ही बाइक दी जाती है...साथ ही चेतावनी भी कि किसी दिन तुम को बिना हैलमेट के बाइक चलाते देख लिया तो उसके बाद तुम्हें बाइक नहीं दी जाएगी।'
"हाँ राहुल हमें इस तरह का अनुशासन बुरा तो लगता है पर वह हमारे भले के लिए ही ऐसा करते हैं।'
 राहुल ने पुन: कहा -"सुना है कि कार चलाने बाला बच्चा भी कम उम्र का था।....लोगों ने कार का नंबर नोट कर लिया है।...एक दो दिन में पकड़ कर उस पर भी कार्य वाही होगी।'
  "ऐसे लोगों के साथ ट्रेफिक पुलिस वालों को भी सख्ती बरतनी चाहिए ।'
 " हाँ यार लगाम तो लगानी चाहिए । ...देख वो हमारी मैडम क्लास लेने आ रही हैं,हम चलते हैं ...शाम को संयम को देखने अस्पताल चलेंगे ।'
    email        agarwalpavitra78@gmail.com--
-पवित्रा अग्रवाल
 

गुरुवार, 18 मई 2017

स्वाद में क्या रखा है


  बाल कहानी  

                  स्वाद में क्या रखा है
                                                  
                                                      पवित्रा अग्रवाल

    ध्रुव को  घर से बाहर जाता देख कर माँ ने उसे रोकते हुए पूछा--
 "बेटा ध्रुव तुम कहीं बाहर जा रहे हो ?'
 "हाँ माँ अपने दोस्त कपिल के पास जा रहा हूँ....आपको कुछ काम था ?'
 "तुझे तो मालुम है आज पापा के कुछ दोस्त डिनर पर आ रहे हैं।खाना बनाने के लिए मिसरानी भी आ गई है।उसे कुछ सामान चाहिए था।तू बाजार से ला देगा ?'
 "क्यों नहीं माँ ...आप लिस्ट बना कर दे दीजिए मैं अभी साइकिल पर जा कर ला देता हूँ ।'
 "लिस्ट तो मैं ने बना दी है। अभी ला कर देती हूँ ।'
 "कौन कौन सी सब्जियाँ बनवा रही हो माँ ?'
 "छोले,मटर पनीर,दम आलू बनवा रही हूँ।'
 "और क्या क्या बनवा रही हो ?'
 "वेजीटेबिल पुलाव ,रायता और नान ।'
 "मिठाई में क्या रहेगा ?'
 "रस मलाई और गुलाब जामुन मैं ने इस लिस्ट में लिख दी है वह तुम ले आना ।'
 "मम्मी इस लिस्ट में अजीमो मोटो भी लाने को लिखा है।...अजीमो मोटो क्यों ?'
 "पता नहीं ये क्या होता है।...मैं ने तो कभी डाला नहीं पर मिसरानी कह रही थी इस से सब्जी का स्वाद बहुत बढ़ जाता है।'
 "माँ आप जो खाना बनाती हो क्या वह कम स्वादिष्ट होता है ?..पर स्वाद बढ़ाने के लिए इस तरह के रसायन डालना अच्छी बात नहीं है।'
 "क्या इस से कुछ नुकसान होता है ?'
 "माँ यह एक तरह का रसायन है ।इसका साइन्टीफिक नाम सोडियम मोनो ग्लूकोनेट है।अक्सर होटलों आदि में स्वाद बढ़ाने के लिए इसे डाला जाता है । स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होता है।कहते हैं इसका असर सीधे दिमाग पर होता है ।माँ मिसरानी से मना करदो कि हमें खाने में अजीमोंमोटो नहीं डालना है।ऐसा स्वाद किस काम का जो बीमारियों को दावत दे।'
 "तू बिलकुल ठीक कह रहा है इसे मत लाना ।पर तुम यह सब कैसे जानते हो...क्या स्कूल  में यह भी पढ़ाया जाता है ?'
 "आप को तो पता है माँ मुझे हैल्थ संबंधी विषयों में बहुत इन्ट्रेस्ट है और पत्र .पत्रिकाएं पढ़ने का शौक भी है और आज कल पत्र पत्रिकाओं में सब आता है।..माँ आप भी समय निकाल कर पत्रिकाए पढ़ा करो ।..आप कहें तो मैं आपके लिए हिन्दी की पत्रिकाएं ला दिया करूँगा ।'
 "हाँ बेटा ला देना मैं भी अब से पढ़ने की
आदत डालूँगी ।'
          
    मेरे ब्लोग्स --    

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सोमवार, 24 अप्रैल 2017

ठंडा ठंडा टेस्टी टेस्टी

बाल कहानी
                   ठंडा ठंडा टेस्टी टेस्टी
                                                                    पवित्रा अग्रवाल 

       श्लोक स्कूल से लौट कर गले पर हाथ रखते हुए बोला – ‘माँ गले में बहुत दर्द हो रहा है ,कुछ निगलने में भी दर्द है ’
         ‘श्लोक सुबह तक तो तुम बिलकुल ठीक थे...अचानक गले में दर्द कैसे होने लगा ?बाहर कुछ खाया पिया था क्या ?’
    ‘मम्मी खाया तो कुछ नहीं था पर इंटरवल में बाटल का पानी ख़त्म हो गया था तो स्कूल से लौटते समय बंडी पर गन्ने का रस पिया था ...ठंडा ठंडा बहुत स्वादिष्ट था .उसमे बर्फ ,नीबू का रस और मसाला भी पड़ा था .मम्मी सच में इतना टेस्टी था कि मैं एक गिलास की जगह दो गिलास पी गया .’
       अपनी धुन में श्लोक इतना उत्साहित होकर बोले जा रहा था ...वह भूल गया था कि अभी उसने माँ से गले के दर्द की शिकायत की है .जब उसका ध्यान सामने
खड़ी उसे घूरती माँ पर गया तो वह अचकचा कर चुप हो गया .
     ‘हाँ तो अब उस टेस्टी टेस्टी गन्ने के रस पीने का मजा भी लूटो .तुम्हे पता है न जब भी तुम यह रस पीते हो तो बीमार हो जाते हो और फिर एंटीबाइटिक्स से ही ठीक होते हो ’
    ‘सोरी मम्मी मैं भूल गया था ...सर में भी बहुत दर्द है.. .कहीं बुखार तो नहीं है?’
    माँ ने उसे छूकर देखा-- ‘अरे तुझे तो बहुत तेज बुखार है ,परीक्षा निकट है और पापा भी टूर पर गए हुए हैं.पहले बुखार कम करने के लिए क्रोसिन की गोली खाओ फिर डॉक्टर के पास चलते हैं ’
      तभी क्रिकेट खेलने के लिए बुलाने उसके दोस्त आगये – ‘आंटी डॉक्टर के पास कौन जा रहा है ?’
     ‘श्लोक के गले में दर्द है और बुखार भी तेज है ...स्कूल से बाहर वाली बंडी से गन्ने का रस पीकर आया है  ,लगता है इन्फेक्शन हो गया है ’
      पंकज ने कहा –‘ आंटी मैं तो रोज पीता हूँ ,मुझे तो कुछ नहीं होता .’
      सुबीर बोला – ‘मैंने एक बार पिया था तो लूज मोशन हो गए थे तब घर पर बहुत डांट पड़ी थी .उसके बाद फिर कभी नहीं पिया ’
     ‘बेटा हरेक के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता अलग अलग होती है.श्लोक को आइसक्रीम ,ठन्डे जूस बिलकुल सूट नहीं करते .इनके सेवन से सबसे पहले इसका गला ख़राब होता है फिर ठीक होने में बहुत दिन लग जाते हैं .इसके पीने से भले ही तुम्हे कुछ नहीं होता पर यह तो तुमको भी मालूम है कि गन्ने का रस कितना अनहाइजिनिक होता है .’
‘वह कैसे आंटी ?’
‘गन्ने सड़क के किनारे एसे ही रखे रहते हैं और बंडी वाले रस निकालने के लिए उन्हें उठा उठा कर मशीन में डालते जाते हैं और मशीन में मोड़ मोड़ कर तब तक डालते रहते हैं जब तक उसका पूरा रस न निकल आये .अब गन्ने में कुछ गन्दा चिपका होगा तो वह रस में ही तो मिलेगा न...मैं ठीक कह रही हूँ हैं न ?’
‘आंटी आप बिलकुल ठीक कह रही हैं पर वह गन्नों को धो कर रखते हैं ’
‘बेटा गन्नों पर पानी डालना या उन्हें पानी में से डुबो कर निकलना धोना तो नहीं होता ?...देखो खाना खाने के बाद प्लेट को पानी में से डुबो कर निकालने से वह साफ तो नहीं होती... खाना लगा रह जाता है .साफ करने के लिए उसे रगड़ कर मांजना फिर धोना पड़ता है .पर गन्ने इस तरह से कहाँ साफ हो पाते हैं... गन्ने के रस पर मखियाँ भी कितनी भिनभिनाती रहती हैं .’
‘हाँ आंटी बात तो आप की सही है .
‘एक बात और बेटा वह जो बर्फ स्तेमाल करते हैं वह भी अशुद्ध पानी की हो सकती है .इनके पास पानी की कमी होती है अतः गिलास भी साफ तरह से धुले नहीं होते .वैसे आज कल यह लोग भी प्लास्टिक के गिलास स्तेमाल करने लगे हैं.’
‘आंटी आपने इस विषय पर अच्छी रिसर्च कर रखी है ...आगे से हम भी सचेत रहेंगे ’
‘माँ सब कुछ जानते बुझते भी कभी कभी मन कर आता है पर आगे से ध्यान रखूंगा... अब आप मुझे जल्दी से क्रोसिन दे दो .’
‘गोली लेकर तुम आराम करो हिम्मत है तो दोस्तों से बात करो .मैं जल्दी से घर के कुछ काम निबटा लेती हूँ फिर डाक्टर के पास चलेंगे .’
‘आंटी इसे आराम करने दीजिये ...हम कल मिलते हैं ...बाय श्लोक .’
पवित्रा अग्रवाल

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

रंगों की धारा

बाल कहानी 

                         रंगों की धारा
                                                  पवित्रा अग्रवाल
    
        नेहा और तुषार को जब से पता चला था कि होली पर दीदी के साथ जीजा जी भी आ रहे हैं तब से दोनों बहुत खुश थे और बेसब्री से होली और जीजा जी का इंतजार कर रहे थे।
      उन्होंने अपने पड़ोस के घरों में अपने दोस्तों को भाभी और जीजा जी के साथ बड़ी उमंग से होली खेलते देखा था। अपने कई दोस्तों  से उन्होंने होली के कई मजेदार किस्से भी सुने थे कि कैसे उन्होंने अपनी भाभी को रंग लगाया और जीजा जी को होली पर कैसे छकाया।
      तब नेहा व तुषार के न तो भाभी थीं और न जीजा अत: इस तरह के मजेदार अनुभव भी उनके पास नहीं थे। अभी तीन महीने पूर्व ही उनकी दीदी की शादी हुई थी, इस तरह एक जीजा तो उन्हें भी मिल गए थे। नेहा और तुषार की तीव्र इच्छा थी कि होली पर दीदी के साथ जीजा जी भी उनके घर आए तो खूब मजा आएगा।
     दीदी का पत्र आया था कि होली से एक दिन पूर्व वह जीजा जी के साथ होली मनाने आ रही हैं। यह समाचार सुनते ही दोनों खुशी से उछल पड़े थे और दोनों भाई-बहन मिलकर जीजा जी से होली खेलने के नए-नए तरीके सोच रहे थे। सोचते-सोचते ही दिन बीत गए और दीदी-जीजा जी आ गए और फिर होली भी आ गई।
       होली की सुबह दीदी जल्दी जाग गई थीं और मम्मी के साथ बातों में व्यस्त हो गई थी। जीजा जी अपने कमरे में गहरी नींद में सोए थे। बस नेहा और तुषार को मौका मिल गया। तुषार दरवाजे पर पहरेदारी करने लगा इतनी देर में नेहा ने हरे-लाल रंग की सूखे रंगों की पुड़िया उठाई और जीजा जी के बालों में डाल आई। किसी को पता भी नहीं चला और वह दोनों पुन: अपने बिस्तर में जाकर सो गए।
     सुबह उठते ही उनके जीजा जी को बाल काढ़ने की आदत थी। दीदी ने जब उन्हें चाय पीने के लिए जगाया तो बाल काढ़ कर उन्होंने मुँह धोने के लिए जैसे ही चेहरे पर पानी डाला तो मुँह पर गिरे हुए सूखे रंग ने अपना कमाल दिखा दिया। अपने चेहरे व हाथों में लगा रंग देखकर वे आश्चर्य में पड़ गए और दीदी को पुकार कर कहा -- "हेमा तुम तो बहुत होशियार निकलीं। सुबह-सुबह रंग लगा दिया और हमें पता भी नहीं चला।'
    "रंग ? ... कैसा रंग ? ... फिर जीजा जी का रंग से पुता चेहरा देख कर दीदी की हँसी छूट गई। किसने लगाया ये रंग ?...मैंने तो अभी तक रंग छुआ भी नहीं है और ना ही मेरे पास रंग है।'
    "तुमने नहीं नहीं लगाया ?...तब तो जरूर नेहा व तुषार की शरारत है।'
   "लेकिन वे दोनों तो अभी तक सो रहे हैं...खैर किसी ने भी लगाया हो...लेकिन इस रूप में तुम बहुत अच्छे लग रहे हो।' दीदी ने जीजा जी को छेड़ा था।
     जीजा जी ने अपने हाथों में लगा रंग जीजी के मुँह पर मलते हुए कहा, "अब तुम भी अच्छी लग रही हो।'
       नेहा व तुषार बराबर वाले कमरे में नींद का नाटक करते हुए दीदी-जीजा जी की बातों का आनंद ले रहे थे। तभी जीजा जी बोले, "हेमा यदि तुषार और नेहा सो रहे हैं तो फिर घर में बचा कौन। जरूर ये काम मम्मी-पापा का होगा फिर तो मैं भी उन्हें रंग लगा सकता हूँ।    उन्होंने बाथरूम में जाकर हाथ गीले किए और मम्मी-पापा के मुँह पर मलते हुए बोले- "आपके होली खेलने का अंदाज हमें बहुत अच्छा लगा। आपको भी होली मुबारक।'
     जब तक मम्मी-पापा दमाद की बात समझ पाते तब तक तुषार ने एक जग पानी जीजा जी के सिर पर डाल दिया था। हरे-लाल रंगों की धाराएँ उनके बालों से बहने लगी थीं।
    तुषार व नेहा ताली बजा-बजा कर हँस रहे थे 'जीजा जी ससुराल की पहली होली मुबारक हो। होली खेलने का हमारा अंदाज पसंद आया आपको ?'
     जीजी जी उन्हें पकड़ने के लिए  भागे तब तक वह दरवाजे से बाहर निकल चुके थे।
   (मेरे दूसरे बाल कहानी संग्रह 'चिड़िया मैं बन जाऊं 'में से एक कहानी )

 ईमेल -- agarwalpavitra78@gmail.com


मेरे ब्लोग्स ---

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

बरफ का गोला


बाल कहानी
                              बरफ का गोला 
                                                
                                                       पवित्रा अग्रवाल
 
         स्कूल के गेट से बाहर निकलते ही रंजीता की नजर ठेले पर बिक रहे बर्फ के रंग बिरंगे गोलों पर पड़ी ।गर्मी से बेहाल रंजीता का दिल भी उसे खाने को मचल उठा। उसने अपनी सहेली विपमा से कहा देख लड़कियाँ कैसे चुसकी ले ले कर बर्फ के गोले खा रही हैं ,चल आज अपन भी खाते हैं।'
 "ना बाबा मैं इनको नहीं खाने वाली ।मम्मी ने मुझे कभी नहीं खाने दिया पर एक बार ऐसे ही स्कूल से निकलते हुए मैं ने भी खूब चुस्की ले ले कर इसे खाया था और मैं बीमार पड़ गई थी। कई दिन मुँह से आवाज नहीं निकली थी. तब से मैं ने तोबा करली कि इसे कभी नहीं खाना है।'
 "तुम देखो रोज कितने बच्चे इसे खाते हैं और वास्तव में सबसे ज्यादा भीड़ भी इसी के ठेले पर रहती है,वह तो बीमार नहीं पड़ते । तू किसी और वजह से बीमार पड़ी होगी ।'
 "रंजीता सोचने की कई बातें हैं, इसमें से कितने बीमार पड़ते हैं हमें कैसे पता लगेगा ? गला खराब होना, खाँसी जुकाम होना तो अब आम बीमारी बन गई है। तकलीफ हुई और दवा खाली लेकिन हम में से बहुत से यह जानने की कोशिश नहीं करते कि इस के पीछे कहीं हमारे खान पान की आदतें तो नहीं हैं। जब मैं बीमार हुई तो मम्मी डाक्टर के ले गई थीं। डाक्टर ने सब से पहले यही पूछा कि तुमने आइसक्रीम, बाहर का जूस आदि पिया था क्या ?'
 "मुझसे पहले मम्मी ने कहा "हमारे बच्चे बाहर इस तरह की चीजें नहीं खाते पीते हैं' तब मुझे ध्यान आया कि मैं ने कल बर्फ का गोला खाया था।
 "फिर तूने मम्मी को बताया ?'
 "हाँ मैं ने डाक्टर साहब के सामने ही यह बात स्वीकार करली ।मम्मी को बुरा तो लगा पर वह मेरे सच बोलने पर खुश भी हुई ।'
 "बस आपकी इस तकलीफ का कारण यही बर्फ का गोला है' डाक्टर अंकल ने कहा था
 "पर वहाँ तो बहुत बच्चे इसे खाते हैं ।'
 "उनको भी कुछ हुआ या नहीं आपको कैसे पता चलेगा ।.. जो भी माता पिता अपने बच्चों को जुकाम, खॉसी, गले में दर्द  की तकलीफ ले कर यहाँ आते हैं मैं सब से पहले यही प्रश्न पूछता हूँ और अधिकतर मामलों में रोड साइड स्टालों से इस तरह की चीज खाना उनके इंफैक्शन का कारण होता है।'
 "वह लोग सफाई से नहीं बनाते इस लिए ?'
 "हाँ वह भी एक कारण हो सकता है पर तुम लोगों को इस सब से बचना चाहिए खास कर ठण्डी चीजों से जैसे बरफ के गोले, आइसक्रीम आदि में यह खतरा ज्यादा होता है ?
 मैं ने पूछा था -"ऐसा क्यों डाक्टर अंकल ?'
  "बेटा आपके घर में पानी साफ करने के लिए कोई प्यूरीफायर  है ?'
 "हाँ है और हम तो स्कूल भी अपना पानी ले कर जाते हैं।'
 " ये बर्फ का गोला बेचने वालों की बर्फ साघारण पानी की होती है ,उसमें भी वह रंग बिरंगे सिरप डाल कर उसे और हानिकारक बना देते हैं। ये सिरप अपने रंगों के कारण सब को अपनी तरफ आकर्षित तो करते हैं पर यही बीमारी की जड़ हैं। ये सब से सस्ते वाले रंगों का  प्रयोग करते हैं । किसी पर यह जल्दी ही असर दिखाते हैं किसी पर धीरे धीरे केंन्सर आदि बीमारी के रूप में गम्भीर असर दिखाते हैं ।'
 "बस रंजीता उस दिन के बाद से मैं इन ठेलों आदि से कुछ नहीं खाती ।'
 "धन्यवाद विपमा आगे से मैं भी इन बातों का घ्यान रखूँगी ।'
        
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-पवित्रा अग्रवाल
 

शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

मम्मी ने कहा था

बाल कहानी
                   
मम्मी ने कहा था    
                                                          पवित्रा अग्रवाल


     दिसंबर की छुट्टियां   शुरू होते ही वरुण ने  ऊँचा स्टूल लगा कर अलमारी पर से कुछ पतंगें और चरक,  माँजा  नीचे उतार लिया ।
    माँ ने कहा "बेटा वरुण तुमने इतनी सारी पंतगें क्यों जमा की हुई हैं... जितनी जरूरत हो उतनी ही लाया  करो।...पड़े पड़े खराब भी होती हैं।'
 वरुण खुश हो कर बोला -- "अरे मम्मी इनमें से एक भी मेरी खरीदी हुई नहीं हैं, सब कट कर आई हुई  पतंगें हैं। '
 "तुम से मना किया था  न, फिर भी तुम पतंगें लूटते हो ? '
 "अरे माँ अपनी छत इतनी बड़ी है कि पतंगें अपने आप आ कर गिर जाती हैं।...वही पतंगें मैं जमा कर  लेता हूँ'
 " इनमें से कुछ पतंगें तो  बहुत खराब हो रही हैं पर तूने उनको भी संभाल कर क्यों रखा हुआ है ?'
 'फिर इनका क्या करूँ माँ ?'
 "पतंग के दिनों में बहुत से गरीब बच्चे अपनी जान की परवाह न करते हुए पतंग लूटने के लिए सड़कों पर भागते फिरते हैं,यह पतंगें उन को दी जा सकती थीं  ।'
 "हाँ माँ आपकी सलाह तो अच्छी है पर पतंगें देख कर उन्हें सहेज कर रखने या खुद ही उड़ाने का  लालच  आ जाता है।'

     एक दिन वरूण दोस्तों के साथ क्रिकेट खेल कर लौटा था ,उसकी नजर अपने बगीचे में गई। उसने  देखा कि  बगीचे में एक लड़का घुसा हुआ था और  उसने हाथ में एक लोहे की छड़ उठा रखी थी ,उस  से पतंग निकालने की वह कोशिश कर रहा था।
   वरूण एक दम से चिल्लाया -- "अरे यह क्या कर रहे हो ?'
 लड़के ने डर के मारे लोहे की छड़ वहीं फेंक दी और रोने लगा - ' भैया मैं चोर नहीं हूँ ।अभी एक पतंग कट कर यहाँ लटक गई थी, उसको निकालने की कोशिश कर रहा था।'
     "तुम डरो नहीं, मैं तुम्हें चोर नहीं समझ रहा पर क्या तुम्हें मालुम है कि पेड़ के पास से करेंट के तार जा रहे हैं... पतंग निकालने के चक्कर में यदि यह छड़ तारों से छू गई तो तुम अभी यहीं करेंट लगने से मर  जाओगे।दो चार रुपए की पतंग के लिए तुम अपनी जान खतरे में क्यों डाल रहे हो ? '
    'हाँ भैया गलती हो गई ...मैं ने यह तो सोचा ही नहीं था पर मैं अभी मरना नहीं चाहता। मेरे छोटे भाई को पोलियो है, आज वह पतंग के लिए जिद्द कर रहा था ...मैं ने सोचा उसके लिए पतंग ले जाऊँगा तो  वह खुश हो जाएगा ।'
 "तुम्हारे घर में कौन कौन है ?'
 "माँ है ,बापू हैं,एक छोटा भाई है । माँ दो घरों का खाना बनाती है...बापू केले की बंडी लगाते हैं।पर  उनको  शराब पीने की लत है ,वह घर में खर्च को कुछ नहीं देते और हम लोगों को बहुत मारते पीटते  हैं।'
 "तुम स्कूल जाते हो ? '
 "हाँ ,पास के सरकारी स्कूल में चौथी कक्षा में पढ़ता हूँ।पहले मैं खाली समय में एक दुकान में काम भी करता था पर जब से सरकार ने बच्चों से काम कराने पर रोक लगाई है  तब से मेरी नौकरी चली  गई है।.. फिर भी चुपके से दो घरों में कार साफ करने का काम अभी भी कर रहा हूँ।'


 "ठीक है मैं पापा से बात करता हूँ, हमारी कार गैराज में रहती हैं किसी को पता भी नहीं चलेगा कि   उसकी सफाई कौन करता है। तुम एक दो दिन बाद आना ।'
 "भैया आप तो बहुत अच्छे हो, अब मैं चलूँ.... दो दिन बाद आऊँगा ।'
  तुम्हारा नाम क्या है ?'
 "शंकर '
 वरुण को अचानक मम्मी की एक बात याद आ गई। उसने कहा"--" शंकर तुम दो मिनट यहीं रूको ,मैं अभी आता हूँ।'
वरूण ने अन्दर से पाँच छह पतंगे और डोर लाकर उसे देते हुए कहा --" लो यह अपने भाई को दे  देना  पर उस से कहना वह इन्हें सड़क पर नहीं, किसी सुरक्षित जगह से उड़ाए ।'
 पतंगें पाकर शंकर के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई।
 खिड़की में से मम्मी यह सब देख कर बहुत खुश हो रही थीं।

 
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