शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

पंतग लूटने का मजा

बाल कहानी    
 
                        पंतग लूटने का मजा
                                                     
                                                     पवित्रा अग्रवाल

 "देबू आज तो स्कूल की छुट्टी हो गई है,मेरे घर चल पतंग उड़ायेंगे' --सुमित ने कहा
 "अरे यार अभी तो संक्रान्ति को आने में बहुत दिन हैं...इतने दिन पहले नहीं, वैसे भी अभी तो आसमान में  एक भी पतंग उड़ती नहीं दिखाई दे रही।'
 "शुरुआत हम ही करते हैं,तू देखना एक पतंग उड़ते ही  अनेक पतंगें उड़ने लगेंगी।'
 "सुमित, क्या बाजार में पंतग मिलनी शुरू हो गई ?'
 "पता नहीं पर मेरे पास तो पिछले साल की बहुत सी पंतग रखी हैं ।'
 "तेरी मम्मी गुस्सा तो नहीं करेंगी ?'
 "नही मेरी मम्मी कुछ नहीं कहतीं,उन्हें घर -बाहर का काम ही इतना रहता है कि यह सब देखने की फुर्सत उनके पास नहीं है ।
 " अरे वाह सुमित तेरी मम्मी तो बहुत अच्छी हैं...मेरी मम्मी की तो मेरे हर काम पर नजर रहती है। हर समय  टोका टाकी करती रहती हैं कि यह करो यह मत करो ।'
 "असल में मेरी मम्मी नौकरी करती हैं न इसलिये उनके पास यह सब देखने को समय नहीं रहता ।'
 "पहले मेरी मम्मी भी काम करती थीं पर हम लोगों की देख भाल अच्छी तरह हो सके इसलिये काम छोड़ दिया ।'
 "अच्छा...वैसे मेरे पापा भी यही चाहते थे पर मेरी मम्मी काम छोड़ने को तैयार नहीं थीं ...चल छोड़ इन सब बातों को ... पतंग ले कर छत पर चलते हैं ।'
 "ठीक है चलते हैं ।'
 "वैसे देबू मुझे पतंग उड़ाने की तुलना में लूटने में ज्यादा मजा आता है...पतंग लूटने के चक्कर में एक बार तो मैं छत से नीचे गिरते गिरते बचा था।'
 "फिर भी तेरे मम्मी पापा तुझे पतंग उड़ाने देते हैं ?'
 "मैं ने यह बात किसी को नहीं बताई वरना मेरा पतंग उड़ाना बंद हो जाता ।'
 "सुमित ,मेरी मम्मी ने मुझे एक ही शर्त पर पतंग उड़ाने की छूट दी है कि मैं सिर्फ पतंग उड़ाऊं ,कटी पतंग को लूटने की कोशिश बिल्कुल न करूँ ।'
 "फिर तू उनकी आज्ञा का पालन करता है ?'
 "हाí मैं पतंग लूटने उसके पीछे नहीं भागता ।पतंग लूटने के चक्कर में जान जा सकती है।सब से बुरा तो तब होता है कि जान तो जैसे तैसे बच गई पर जिन्दगी भर के लिए अपाहिज हो गए ।असल में मेरे एक चाचा हैं। वह दूसरे शहर में रहते हैं, वो बैसाखी के सहारे चलते हैं ।पापा ने बताया था कि वह बचपन में पतंग लूटने के चक्कर में छत से गिर पड़े थे ।....
 उनकी हालत देख कर मैं ने मम्मी पापा से वायदा किया था कि मैं पतंग लूटने की कोशिश कभी नहीं करूँगा।..पिछले वर्ष अखवार में पढ़ा था कि एक बच्चा छत पर पड़ी लोहे की रौड से कटी पतंग रोकने के कोशिश कर रहा था,रौड हाइ टेंशन वायर से छू गई ।बच्चे की वहीं मौत हो गई थी ।'
 "हाँ पतंग के दिनों में एसी कई दुर्घटनायें हर वर्ष होती हैं।...पर दोस्त देबू मैं भी आज तुझ से वादा करता हूँ कि कटी पतंग को पकड़ने की कोशिश कभी नहीं करूँगा,अब चलें ?'

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

थोड़ी सी सूझबूझ

बाल कहानी 
                    थोड़ी सी सूझबूझ             

                                                  पवित्रा अग्रवाल
 
अंगद को स्कूल आते देख उसके मित्र सोमेश ने पूछा ---
        "अंगद तुम तो बहुत रेगुलर हो पर इतने दिनों से स्कूल क्यों नहीं आ रहे थे ?'
    उदास स्वर में अंगद ने कहा--"सोमेश ,मेरे दादा जी नहीं रहे ।'
 "अरे , क्या वो बीमार थे ?'
 "वैसे उन्हें बी पी हाई रहता था तो उसकी वह दवा खाते थे।पर इस समय तो बिल्कुल ठीक थे।मेरी तीन चार दिन की छुट्टी थीं तो दादा,दादी बोले चलो हरिद्वार चलते हैं। गंगा नहा कर एक दो दिन वहाँ रुकेंगे,मैं भी तैयार हो गया।...मुझे क्या पता था कि ऐसा हो जाएगा।'
 "तो क्या उनकी मौत हरिद्वार जा कर हुई थी ?'
 "नहीं हरिद्वार जाते समय ट्रेन में उनकी तबियत खराब हो गई थी।टाइलेट से लौटे तो पसीने में भीगे हुए थे। मैं ने और दादी ने उन्हें बर्थ पर लिटा कर पानी पिलाया फिर उनकी हवा करने लगे । साथ ही गाड़ी  हरिद्वार पहुंचने का इंतजार करने लगे।'
 "हरिद्वार कितनी दूर रह गया था ?'
 "करीब दो घन्टे का रास्ता बचा था ।'
 "फिर तुमने कोई मेडिकल ऐड देने की कोशिश नहीं की ?'
 "मैं क्या मदद करता... मैं कोई डाक्टर तो था नहीं।' 
 "अरे यार मरीज की मदद करने के लिए डाक्टर होना जरूरी नहीं होता। मेरे पापा एक बार दिल्ली से ट्रेन में अकेले आ रहे थे। उनकी तबियत एक दम से खराब हो गई था। उनके साथ के लोगों ने जैसे ही उनकी हालत बिगड़ते देखी  वह लोग एक दम से एक्टिव हो गए।हर केबिन में जाकर पूछा कि आप में से कोई डाक्टर हैं क्या और उन में से एक डाक्टर निकल आया। दवाएं उनके पास थीं,उनसे पापा को आराम हो गया।'
 "उन्हें क्या हुआ था ?'
 "लूज मोशन्स और वोमेटिंग । ऐसे संकट के समय में टी टी से भी तुरंत सम्पर्क करना चाहिए। वह निकटतम स्टेशन पर डाक्टर की व्यवस्था कर के रख सकता हैं,ट्रेन में भी उनकी नजर में कोई डाक्टर हो तो बुला कर मदद कर सकता है।...कहने का मतलब यह कि कोशिश करने पर मदद की उम्मीद बढ़ जाती है।'
     "हाँ यार तू ठीक कह रहा है। मैं उनकी हालत देख कर इतना घबड़ा गया था कि कुछ सूझा ही नहीं। हो सकता है हमारे भी आस पास की बोगी में कोई डाक्टर रहा हो या मैं टी टी से कहता तो वह भी कुछ मदद कर सकता था। कितना डफर हूँ मैं। काश मेरे दिमाग में भी यह ख्याल आया होता..अटैक के बाद दादा जी हरिद्वार तक जीवित रहे थे,स्टेशन पर उतर कर जब तक डाक्टर साहब आए तब तक उनकी मौत हो चुकी थी ।'
      "बाप रे, अंगद अकेले तूने यह सब कैसे संभाला होगा। फिर तुम उनके शव को यहाँ ले कर आए थे या वहाँ पर ही अंतिम संस्कार कर दिया था ?'
    "अरे यार बड़ा मुश्किल समय था वह। अनजान शहर था । पुलिस ऐसे पूछताछ कर रही थी जैसे हमने उनकी हत्या कर दी हो। मोबाइल पास में था ,निकट के रिश्तेदारों को सूचना दी। तो पता लगा कि हमारे एक रिश्तेदार उस समय गंगा नहाने हरिद्वार आए हुए थे। समाचार मिलते ही वह स्टेशन आ गए। आते ही उन्हों ने सब स्थिति संभाल ली थी।. .. फिर धीरे धीरे परिवार के अन्य लोग आ गए। दूसरे दिन सुबह हरिद्वार में ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया था। कभी कभी मैं गिल्टी महसूस करता हूँ...समय पर मदद मिल जाती तो शायद दादा जी बच जाते।'
    "अंगद, अपने को दोष देने से कोई फायदा नहीं है। तेरी जगह मैं होता तो शायद मैं भी कुछ नहीं कर पाता। वह तो पापा को इस तरह की मदद ट्रेन में मिली थी तो हमें लगा था कि उनके साथ यात्रा कर रहे लोग कितने होशियार और सूझ बूझ वाले थे। हमारे सामने उन्हों ने एक उदाहरण पेश किया था कि अचानक आए संकट से घबड़ाना नहीं चाहिए । थोड़ी सूझबूझ से उसका सामना करना चाहिए।.....चल अब क्लास में चलते हैं।'

मेरे ब्लोग्स ---

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

मुकुल की दीपावली

बाल कहानी

मुकुल की दीपावली

                                            पवित्रा अग्रवाल
              पापा के स्थानांतरण का समाचार सुन कर मुकुल उदास हो गया था। अब फिर एक नई जगह, नया स्कूल, नये साथी, नये शिक्षक। पता नहीं नई जगह उसका मन लगेगा या नहीं लेकिन जाना तो था ही। अभी वह पाँचवीं क्लास पास कर के चुका था। नये स्कूल में दाखिला लेते समय भी वह उत्साहित नहीं था। कक्षा में मुकुल के बराबर की सीट पर सुकेश बैठता था। धीरे-धीरे वह दोनों एक-दूसरे के घनिष्ठ मित्र बन गए और मुकुल की उदासी कहीं गुम होती चली गई।
              सुकेश के घर से स्कूल करीब एक किलोमीटर दूर था। वह पैदल ही स्कूल जाया करता था। रास्ते में मुकुल का घर पड़ता था। सुकेश मुकुल को उसके घर से लेते हुए साथ स्कूल जाता था। दोनों साथ ही लौटते थे। स्कूल में भी साथ ही खेलना, साथ ही खाना।
 दीपावली के चार-पाँच दिन पहले सुकेश ने मुकुल से कहा, "आज स्कूल से लौटते समय कुछ पटाखे, बम आदि लेते हुए घर चलेंगे...तुम्हें चाहिए तो तुम भी खरीद लेना।'
            पटाखों का नाम सुनते ही मुकुल की आँखों में चमक आ गई फिर एकाएक वह उदास हो गया और बोला- "मैं तुम्हारे साथ चलूँगा लेकिन पटाखे नहीं ख़रीदूँगा। हमारे घर दीपावली नहीं मनाई जाती।"
       "अरे दीपावली तो हम हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है। तुम्हारे यहाँ दीपावली क्यों नहीं मनाई जाती ?'
      "पहले हमारे घर में भी दीपावली मनाई जाती थी....करीब सात वर्ष पहले जब मैं चार वर्ष का था तब मेरी बहन की मृत्यु दीपावली के दिन हो गई थी। तब से हमारे घर में दीपावली नहीं मनाई जाती।'
      'अरे यह तो पुरानी बातें हैं इन को अब कौन मानता है,तुम्हारे घर में जरूर तुम्हारे दादा-दादी होंगे इसी लिए तुम्हारे यहाँ दीपावली को खोटा मान लिया गया है।'
         "हमारे दादा-दादी नहीं हैं और हमारे यहाँ इस त्योहार को खोटा भी नहीं माना जाता पर इस दिन मम्मी-पापा  बहुत उदास हो जाते हैं...हमारे एक ही बहन थी...उसकी याद आ जाती है फिर दीपावली मनाने का मन ही नहीं करता।'
      "क्या हुआ था तुम्हारी बहन को ?' सुकेश ने पूछा।
     "मेरी बहन के दिल  में छेद था। मुझ से वह दो वर्ष बड़ी थी। दीपावली के दिन अचानक उसकी तबियत खराब हो गई। दीपावली का दिन होने की वजह से डॉक्टर भी समय से नहीं मिल पाए। अस्पताल तक जाते-जाते रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो गई थी।"
        मुकुल को सांत्वना देते हुए सुकेश बोला, "यह तो सचमुच बहुत बुरा हुआ, वैसे भी एक बहन तो सब की होनी ही चाहिये ।घर की रौनक बहन से ही होती है... एक बात बताओ, तुम्हारा मन दीपावली मनाने को नहीं करता ?'
     "सच कहूँ सुकेश, दीपावली का न मनाया जाना तो मुझे बुरा नहीं लगता लेकिन अब पटाखे, बम, अनार जलाने को मेरा भी मन करने लगा है।'
 "कोई बात नहीं मुकुल, आज मैं भी पटाखे नहीं ख़रीदूँगा। अपन सीधे घर जाएँगे।'
 
        ज  दीपावली थी। सुकेश दोपहर को अचानक मुकुल के घर चला आया और मुकुल की
मम्मी से बोला - "आंटी, मैं मुकुल को अपने घर ले जाना चाहता हूँ। हम साथ-साथ दीपावली मनाएँगे, सुबह उसे वापस भेज दूँगा।'
      "लेकिन बेटे, हम ने बहुत दिन से दीपावली नहीं मनाई।'  आँखें पोंछते हुए मुकुल की मम्मी ने कहा।
     सुकेश कुछ कहता, उससे पहले ही मुकुल के पिताजी बोले - "हाँ रेखा यह सही है कि हमने बहुत दिन से दीपावली नहीं मनाई पर हमारे घर दीपावली मनाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है... तब मुकुल छोटा था और पटाखों से डरता था और हमारा दुख भी ताजा था  इसलिए दीपावली मनाने का मन नहीं करता था ....पर अब मुकुल बड़ा हो रहा है ,उसका मन भी पटाखे जलाने को करता होगा। यह उम्र हंसने-खेलने की है... मायूस होकर घर में बैठने की नहीं।..इस वर्ष से हम भी दीपावली मनाएँगे।'
     "ठीक है बेटे, तुम्हारे पापा ने इजाजत दे दी है तो कपड़े बदल कर चले जाओ लेकिन पटाखे छोड़ने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना। एक बाल्टी पानी पास में अवश्य रखना ताकि गलती से किसी के कपड़ों में  आग लग जाए तो बुझाई जा सके। लंबी स्टिक से पटाखे को आग लगाना। पटाखों के बंडल को पटाखे जलाने की जगह से दूर रखना....हो सके तो घर के बड़े सदस्यों की देख-रेख में बम, अनार, रॉकेट आदि जलाना।'
    मम्मी ने कुछ रुपये मुकुल को देते हुए कहा - "इन से तुम पटाखे खरीद लाना।'
       " मैं बाजार से मिठाई,दीये और पूजा का सामान लेने जा रहा हूँ...पटाखे खरीद कर तुम दोनों पहले यहाँ दीपावली मनाओ फिर दोस्तों के साथ मनाना।'
 "थैंक्यू मम्मी, थैंक्यू पापा' कहते हुए मुकुल के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गई और वह सुकेश के साथ पटाखे लेने चल पड़ा।

-पवित्रा अग्रवाल
'सृजन कुंज '    पत्रिका के मई -अगस्त 2017  में प्रकाशित              मेरा  साक्षात्कार 

           सामाजिक सरोकार से जुडी लेखिका पवित्रा अग्रवाल से
                 डॉ प्रीति प्रवीण खरे की बातचीत
 

-आप बाल साहित्य को किस तरह परिभाषित करना चाहेंगी?    
     जन्म के बाद बच्चा कुछ वर्ष तक परिवार के साथ बहुत सुरक्षित घेरे में रहता है ,पर धीरे धीरे उसे उस स्कूल के लिए घेरे से बाहर निकलना ही होता है नई स्थितियों से नए लोगों से उस का पाला पड़ता है उसे अच्छा  बुरा ,सही गलत का ज्ञान नहीं होता .उसे उसके लिए तैयार करना होता है .उस समय वह पढ़ना नहीं जानता ,उसे उसकी उम्र के अनुरूप छोटी छोटी कहानियां सुना कर आगे के लिए तैयार किया जाता है और मैं समझती हूँ कहानियों का जन्म भी शायद इसी लिए हुआ होगा . धीरे धीरे वह  क्रमश और बड़े समूह में जाने लगता है .
   मैं समझती हूँ कि  बाल साहित्य जो बच्चो में सूझ बूझ और जागरूकता पैदा करे , सही गलत का ज्ञान कराये,  अंधविश्वासों पर चोट करे .भूत प्रेत, अंध श्रद्धा से बचने की राह दिखाए ‘कुरीतियों से बचने की एक नई  द्रष्टि दे .बाल साहित्य सिर्फ बच्चों के लिए ही नहीं है वह माता पिता को भी राह दिखा सकता है .जब माता पिता रुढ़िवादी है ,अन्धविश्वासी है ,जादू टोनो में विश्वास करने वाले हों तो बच्चों पर उसका प्रभाव पड़ता है अतः बच्चो से पहले तो माता पिता में परिवर्तन की जरुरत होती है .
- बाल साहित्य लेखक/लेखिका को परकाया प्रवेश करना पड़ता है।आपने चुनौतिपूर्ण विधा बाल साहित्य को ही लेखन का माध्यम क्यों बनाया?


   पहली बात तो प्रीती जी मैं केवल बाल लेखिका नहीं हूँ .बाल लेखन की ही तरह मैं ने कहानियां  और लघुकथायें भी समान अधिकार से लिखी हैं .मेरे लेखन की शुरुआत कहानी से हुई थी .पहली कहानी ‘श्राद्ध’ 1974 में आगरा से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘निहारिका में प्रकाशित हुई थी .पहली बाल कहानी  जहान्वी में 1976में दूसरी ‘प्रेस ने चोर पकड़ा ‘1978 में पराग में प्रकाशित हुई थी …उन्ही दिनों कुछ मथुरा रेडियो  स्टेशन से भी प्रसारित हुई थी किन्तु  अब पता नहीं वह कौन सी थी और कहाँ है .
    मेरा जन्म  उत्तर प्रदेश में कासगंज (एटा ) में 1952 हुआ था .पूरी शिक्षा वहीँ हुई .शादी लखनऊ से हुई थी पर मेरे पति केन्द्रीय सेवा में हैदराबाद में थे . 1978 में मैं हैदराबाद आगई थी .उसके बाद  गृहस्थी की नई जिम्मेदारियों के बीच 12 साल तक मेरी कलम मौन रही ..उन दिनों हिंदी की मुख्य पत्रिकाए भी यहाँ  बड़ी मुश्किल से मिलती थीं .

पुनः लेखन कैसे प्रारम्भ हुआ ?

     1990 में मैं बहुत बीमार हुई थी ,एक तरह से नया जीवन मिला था पर जीवन कितना शेष है नहीं पता था .उस समय मेरा बेटा ग्यारह व बेटी पांच वर्ष की थी . हम दोनों का परिवार उत्तर प्रदेश में था .बच्चो के बारे में सोच सोच कर मन बहुत अशांत रहता था ...आसूं ही नहीं सूखते थे . तब मेरे पति लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने पुनः लेखन शुरू करने की सलाह दी...और मुझे भी यह सलाह अच्छी लगी और लेखनी चल निकली और चल ही रही हैं .इस दूसरी पारी में मैंने बाल कहानियां भी बहुत लिखीं पर मुझे यह विधा चुनौती पूर्ण कभी नहीं लगी. कभी एसा महसूस नहीं हुआ कि मुझे परकाया प्रवेश करना पड रहा है.बड़े सहज रूप से लिखा है . 
   - बाल साहित्य लेखन में कौन सी विधा(गद्य/पद्य/दोनों)आपको ज्यादा प्रभावित करती है और क्यों?
     
      बचपन से ही  कविताओं से ज्यादा कहानियों में  मेरा मन लगता था  शायद इसी लिए मेरी मूल विधा गद्य है , यों कुछ बाल कविताये लिखी थीं और वह प्रकाशित भी हुई थीं पर  कहानी मेरी मूल विधा है .
आप वरिष्ठ बाल साहित्यकार हैं।आपके अनुसार बाल साहित्य की भाषा -शैली कैसी होना चाहिए ?
    – मेरे विचार से बा.साहित्य आम भाषा में  बहुत सरल सहज और रोचक हो. पांडित्य  प्रदर्शन न हो . उपदेशात्मक न हो ,वार्तालाप के माध्यम से कहानी आगे बढे तो ज्यादा प्रभावी होती है और बोझिलता से बच जाती है . 
     बाल साहित्य लिखा तो बहुत जा रहा है,लेकिन बच्चों तक सुलभता से नही पहुंच पा रहा है।आपके अनुसार इसकी क्या वजह है?

      बहुत सही बात कही है .कभी कभी तो मुझे लगता है कि बाल साहित्य हम ही लिख रहे हैं और हम ही पढ़ रहे हैं . बच्चों द्वारा बहुत कम पढ़ा जा रहा है.अधिकतर बाल पत्रिकाओ में प्रतिक्रिया बच्चो की नहीं होती हम बड़े ही सराहते रहते हैं .
     बच्चो तक बाल साहित्य न पहुँच पाने का कारण हम माता पिता भी है जो मंहगे से मंहगे खिलोने बच्चों  को लाकर देते हैं किन्तु पत्रिका भी बच्चो को दी जा सकती है इस तरफ उनका ध्यान ही नहीं जाता .पढ़ने का संस्कार बचपन से ही देने की जरुरत है .बच्चा जब पढ़ना नहीं जानता तभी से  बाल पत्रिकाए घर में आनी चाहिए . वह रंग  बिरंगे चित्रों से आकर्षित होगा और उसे उलट पलट कर देखना चाहेगा यह उसका पहला कदम होगा जिसे गति देने की जरुरत है .मेरी पोती मानसी साढ़े पांच वर्ष की है .हम तो उसके साथ नहीं रह पाते पर मेरा  बेटा  उस कमी को फोन से पूरा करने का प्रयास करता था .जब वह ढाई साल की थी तो उसे फोन देकर कहता था दादी दादा से कहानी  सुनो. तब मुझे महसूस हुआ कि इतने छोटे बच्चो के लिए तो मैं ने कुछ लिखा ही नहीं है .कुछ मनगढ़ंत  कहानियां  उसे सुनाती थी पर कहानी सुनने की उसकी प्यास समाप्त ही नहीं होती थी
      .दूसरी बात जो मैं मन गढ़ंत कहानियां  उसे सुनाती थी वह उसके दिमाग में अंकित हो जाती थी ,कुछ दिन बाद  जब वह उसमे से कोई कहानी पुनः सुनने की फरमाइश करती थी तो मैं भूल चुकती थी कि  मैं ने क्या क्या कहा था  और वह मुझे बीच में टोक टोक कर याद  दिलाती थी कि दादी एसा नहीं एसा हुआ था . इस दौरान उसे सुनाने के चक्कर में उस उम्र के बच्चों के लिए भी कुछ कहानियों का निर्माण हुआ.
     स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए( जो खुद पढ़ सकते हों ) पुस्तकालय का उपयोग करने की छूट होनी चाहिए और इसके लिए उन्हें प्रोत्साहित भी करना चाहिए ... वहाँ  बाल पत्रिकाए और बाल साहित्य प्रचुर मात्रा  होना चाहिए .बल्कि मेरा मानना तो यह है कि कक्षा  में सप्ताह में एक दो पीरिएड एसे होने चाहिए कि कोई प्रेरणात्मक कहानी एक बच्चा पढ़े और दूसरे बच्चे सुनें . माता पिता और विद्यालय की उदासीनता से बच्चों तक बाल साहित्य नहीं पहुँच पा रहा है  .
  
बाल साहित्य में चित्रों का क्या महत्व है?

     बाल साहित्य में एक उम्र विशेष तक तो चित्रों का बहुत महत्व है. जब बच्चे पढ़ना नहीं जानते तब वह रंग बिरंगे चित्रों के माध्यम से ही आकर्षित होते हैं और बड़ों से कहते हैं यह कहानी सुनाओ .मेरी पोती मानसी को भी अभी पढ़ना नहीं आता पर वह चित्रों के आधार पर तय करती है कि उसे कौन सी कहानी सुननी है .
     -एक बाल साहित्य लेखक को किन-किन बिंदुओं का विशेष ध्यान रखना चाहिए?
    वैसे मैंने तो कोई बिदु विशेष को ध्यान में रख कर कुछ नहीं लिखा
पर एक जागरूक माँ  की तरह घर बाहर मेरी नज़रें जब जब कुछ खतरों पर पड़ती हैं जैसे बिना स्टॉप के बीच सड़क पर बस से उतरते बच्चे, ऑटो में भेड़ बकरियों की तरह भरे हुए बच्चे ,पतंग उड़ाने और लूटने के चक्कर में सुध बुध खो  कर पतंग के पीछे भागते बच्चे आदि इस तरह की सेंकडों बातों पर ध्यान जाता है तो मेरी कहानी बन जाती है.
    मैं  समझती हूँ उसमे तार्किकता होनी चाहिए , आज का बच्चा बहुत होशियार है .वह कहानी सुन ने के साथ तर्क करता है कि एसा क्यों हुआ...यदि एसा नहीं होता तो क्या  होता आदि

  
  - आपने बाल साहित्य को समृद्ध किया है।बाल साहित्य की दशा और दिशा पर प्रकाश डालने की कृपा करें ?

     – बाल साहित्य बहुत लिखा जा रहा है.समय की मांग के अनुसार नए नए विषयों पर भी लिखा जा रहा  पर उसकी दशा अच्छी इस लिए नहीं है कि वह बच्चो तक नहीं पहुँच पा रहा है .वैसे इधर ‘अभिनव बालमन ‘ और ‘बाल प्रहरी’ द्वारा  जगह जगह बाल कार्य शालाये चलाने के विषय में पढा है भोपाल में ‘अपना बचपन ‘ के संपादक महेश सक्सेना जी भी अपने केंद्र के माध्यम से बच्चो को बढ़ावा दे रहे हैं ,राज कुमार राजन ने भी इधर कदम बढाए हैं .बच्चो का देश के संपादक भी काम कर रहे हैं ...और बहुत जगह भी हो रहे होंगे ,यह साहित्य से बच्चों को जोड़ने का अच्छा प्रयास है . 

  
  -बाल साहित्य में मल्टीमीडिया के सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलुओं को आप किस तरह रेखांकित करेंगी ?

       इसके दोनों तरह के प्रभाव बच्चों पर पड़ते हैं. यह उनके माहोल पर व ग्रहण करने की क्षमता पर  निर्भर करता है कि वह किस तरह ग्रहण करे .जैसे  बच्चों ने एक  फिल्म देखी  उसमे चोरी करने वाले बच्चे को सजा मिलती है उसे बच्चे दो तरह से देखते हैं एक ने सीखा चोरी बहुत बुरी चीज है इसे करने वालों को सजा मिलती है .एक ने सोचा चोरी करते समय उसने यह गलती न की होती तो वह पकड़ा नही जाता .
     मेरी एक  परिचित लड़की आगरा से शादी हो कर यहाँ आई है. वह बता रही थी कि उसने अपनी 8-10 साल की भतीजी से हैदराबाद चलने को कहा तो वह तैयार नहीं हुई . उसने पूछा तुम्हे बुआ पर विश्वास नहीं है ? उस बच्ची ने कहा “आप सावधान इंडिया नहीं देखतीं क्या ? ...आजकल तो माँ बाप पर ही विश्वास नहीं होता ‘आप तो बुआ हैं ’
    मल्टी मिडिया की वजह से बच्चो के ज्ञान का क्षेत्र बहुत विकसित हुआ है.आज के बच्चे बहुत होशियार हैं पर अति हर चीज  की बुरी होती है.उन पर नजर रखनी होगी और समय सीमा भी तय करनी होगी .
        आपके मतानुसार बाल साहित्य लेखक से क्या अपेक्षाएं हैं?

      बाल साहित्य उद्देश्य पूर्ण , बच्चों  में सूझबूझ  व जागरूकता पैदा करने वाला होना चाहिए .अंधविश्वासों ,जादू टोनों , आधारहीन कुरीतियों से तर्क के साथ छुटकारा दिलाने वाला होना चाहिए और आज के  बच्चों पर तो पहले से ज्यादा तरह तरह के खतरे  मडरा रहे हैं उन पर लेखक को कलम चलानी होगी .वैसे वे लिख भी रहे हैं  पर वे उपदेशात्मक नहीं होना चाहिए  .
 
      बाल साहित्य विधा गद्य एवं पद्य लेखक/लेखिका में आप किससे अत्यधिक प्रभावित हैंऔर क्यों?

      किसी लेखक विशेष का नाम तो मैं नहीं ले पाऊंगी क्यों कि नए पुराने  बहुत से लेखक बहुत अच्छा लिख रहे हैं पर हम सभी की कुछ कहानियां बहुत अच्छी होती हैं व कुछ साधारण भी .पर जो भी तार्किकता के आधार पर बच्चे को संतुष्ट कर सके, भाग्यवादी न बनाते हों . कुप्रथाओं का विरोध करते हों और समय के हिसाब से बदल रहे बच्चों की नई  समस्याओं पर कलम चला रहे हों ,मुझे वह अच्छे लगते हैं  .  बचपन में मुझे भूत प्रेत ,राक्षसों , परियों वाली कपोल कल्पित  कहानियां जिन्हें तर्क द्वारा न समझा जा सके पसंद नहीं आती थीं .लेखक रूप में भी इन  विषयों पर मेरी कलम नहीं चली .

    
  बाल साहित्य की कौन-कौन सी पत्रिकाएं आप बार-बार पढ़ना चाहेंगी ?

     बाल साहित्य की बहुत से पत्रिकाए प्रकाशित हो रही है बाल भारती ,बालवाणी ,देवपुत्र ,नंदन ,बाल वाटिका ,बालहंस ,बच्चों का देश,सुमन सौरभ .चम्पक, बाल प्रहरी ,बाल अभिनव आदि सब की अपनी अलग विशेषताएं है मै तो इन्हें पढ़ना चाहूगी ही पर इन्हें बच्चे  पढ़े यह हमारा लक्ष्य होना चाहिए  .मेरे पास जो भी बाल पत्रिकाए आती हैं मेरा प्रयास रहता है कि वह बच्चों को दे दूं .

     आपके लेखन की पसंदीदा विधा क्या है।आपकी अब तक प्रकाशित रचनाओं में कौन- कौन सी रचनाएं हैं?

       मेरी पसंदीदा विधा कहानी है (बाल कहानी ,कहानी और लघु कथाये ) मेरी अब तक 6 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं .उनमे दो कहानी संग्रह ,एक लघु कथा संग्रह, दो बाल कहानी संग्रह हैं. एक बाल कहानी संग्रह का तेलगू भाषा में अनुवाद हुआ है .

     एक लेखक/लेखिका की सभी रचनाएं प्रिय होती हैं।आपकी भी होंगी।उनमें से अति प्रिय रचना कौन सी है  और क्यों ?

   करीब 150 बाल कहानियां मैं ने लिखी हैं .मेरी अधिकतर कहानियां किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चों के लिए हैं.अति प्रिय रचना बताना मुश्किल तो है .
     मुझे अपनी एक कहानी ‘हुक्का गुड़गुड़ाने का चस्का’ बहुत पसंद है.आज शहरों में हुक्का सेंटर बहुत खुल रहे हैं जो कम उम्र के बच्चों को नशे का आदी बना रहे हैं .बच्चो को सही  जानकारी तो होती नहीं है वह तो बस दोस्तों के साथ  फन के लिए वहां चले जाते हैं और इस जाल में फंस जाते हैं.  सर्व प्रथम यह कहानी एक पत्रिका द्वारा  रचना के आग्रह पर उन्हें दी थी .पर सम्पादक जी को लगा कि इस तरह का ज्ञान बच्चों को क्यों दिया जाए ....बाद में यह कहानी ‘बाल भारती’ में प्रकाशित हुई थी
.

    -मुझे विदित है कि आपको मिले सम्मानों की लम्बी सूचि है।कृपया विशिष्ट सम्मानों का उल्लेख कर दीजिए?

     अधिकतर सम्मान पुस्तकों पर मिलते हैं. मैं करीब 40-42वर्षों से लिख व छप रही हूँ पर मेरा पहला बाल कहानी संग्रह 2010 में और दूसरा 2012 में आया और 4-5 अभी आने हैं  .दोनों में 25-25 कहानियां हैं.
    मेरे पहले संग्रह ‘फूलों से प्यार’ को 2012 का द्वितीय भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार ( प्रकाशन विभाग दिल्ली )मिला था .
   इसी पुस्तक पर ‘ राज कुमार राजन फाउंडेशन द्वारा 2014 का पं.सोहन लाल द्विवेदी बाल साहित्यकार पुरस्कार  मिला  .बाल कल्याण और शोध केंद्र भोपाल और म.प्र.तुलसी साहित्य अकादमी द्वारा भी. 
     कुछ  समाचार मुझे पता नही चल पाते .कुछ में दूरी की वजह से चाहते हुए भी ऐसे बाल साहित्य  सम्मेलनों में नहीं  जा पाती . 
    
 -आप अपने लेखन के द्वारा समाज को क्या संदेश देना चाहती हैं?

   मेरा पूरा लेखन सामाजिक सरोकार से जुड़ा है और उद्देश्यपूर्ण है कुछ लिखने के   लिए मैं ने सप्रयास कभी कुछ नहीं लिखा .व्यर्थ के सामाजिक ,धार्मिक आडम्बरों में मेरा विश्वास कभी नहीं रहा .मैं कर्म में विश्वास करती हूँ.पूजा पाठ ,पंडितों द्वारा समस्याओं से छुटकारा दिलाने वाले कर्म कांडों ,ज्योतिशियों , शुभ महूरत आदि में मेरा बिलकुल विश्वास नहीं है . मैं जो हूँ वह मेरी रचनाओं में झलकता है और वही मेरा सन्देश है .


--

मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

विकलांगता का दुःख

बाल कहानी
         विकलांगता का दुःख
                                                              
                                                    पवित्रा अग्रवाल
 
        मदन ने जब आँखें खोलीं तो सामने पिता, माँ व दादी खड़े थे। उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई तो जगह  अनजानी लगी।
  "माँ मैं कहाँ हूँ ?'
  "बेटे, तुम अस्पताल में हो। कल स्कूल जाते समय तुम्हारी कार का एक्सीडेंट हो गया था।'
  "मेरी आँख पर यह पट्टी क्यों है ? हाथ पर भी प्लास्टर है। क्या हाथ की हड्डी टूट गई है ?'
  "हाँ बेटे, तुम्हारे हाथ की हड्डी टूट गई है। एक आँख में भी चोट लगी है।'
    आँख में चोट लगने की बात सुन कर मदन घबरा गया, "आँख में चोट ? माँ कहीं ऐसा तो नहीं कि इस एक आँख से अब मैं देख ही न पाऊँ ?'
  "ऐसा कुछ नहीं होगा। तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगे ।'
 मदन आँखें बंद करके लेट गया। उसे बहुत सी बातें याद आ रही थीं। पिछले वर्ष कक्षा में सोनू के  प्रथम आने पर उसने अपने मित्र अमित से कहा था, "यार, इस बार तो लँगड़े सोनू ने बाजी मार ली।'
    अमित को उसकी बात पसंद नहीं आई थी। उसने कहा था, "मदन, क्या तू खाली सोनू नहीं कह सकता। नाम से पहले लँगड़ा या ऐसा कोई भी विशेषण लगाना जरूरी है ? शर्म की बात है हमारे लिए कि शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के बाद भी पढ़ाई में उससे पीछे हैं।'
         "लँगड़ा है, इसीलिए तो प्रथम आ गया। न तो वह खेल सकता है और न कहीं ज्यादा आ जा सकता है। खाली बैठा क्या करे ... पढ़ता रहता होगा।...ज्यादा पढ़ेगा तो प्रथम तो आएगा ही।'
    अमित ने कहा, "मदन, ये सब फालतू के तर्क हैं। पता नहीं दूसरों की कमियाँ ढूँढ़ने में तुझे क्या मजा आता है। हमें दूसरों की अच्छाई देखनी चाहिए। दिलीप के हाथ में छह उँगली हैं तो तू उसे छंगा कहता है। मोहन को हकला कहता है। सुरेश को मोटा होने की वजह से हाथी कहता है। यह अच्छी बात नहीं है। शारीरिक दोष तो किसी में कभी भी आ सकता है।एक दुर्घटना में सोनू की टाँग कट गई थी तो वह लँगड़ा कर चलता है। तू किसी की शारीरिक कमी का मजाक उड़ाना छोड़ दे।'
        ये बातें याद करके मदन रोने लगा था । उसे लगा कि वह अब एक आँख से देख नहीं पाएगा।
        माँ-पापा यहाँ तक कि डॉक्टर ने भी उसे विश्वास दिलाया था कि वह ठीक हो जाएगा।
 लेकिन कुछ भी ठीक नहीं हुआ था। आँख में कार का शीशा चुभ गया था। डॉक्टर उसकी आँख नहीं बचा पाए। उसे एक कृत्रिम आँख लगा दी गई थी। वह अपने कमरे में बैठा रहता। सोचता रहता था कि नकली आँख देख कर बच्चे उसका मजाक उड़ाएँगे।
           माता-पिता ने उसे बहुत समझाया  लेकिन स्कूल भेजने में सफल नहीं हुए फिर अमित ने ही मदन को समझाया था और कहा था, "यह तुम्हारा भ्रम है। कोई मजाक नहीं उड़ाएगा। नवाब पटौदी की भी एक आँख दुर्घटना में खराब हो गई थी। उनकी भी कृत्रिम आँख लगी है। उसके बाद भी वह विज्ञापनों में काम कर रहे हैं और जहाँ तक मुझे याद पड़ता है बाद में भी वह क्रिकेट खेले हैं। उनकी योग्यता के सामने शारीरिक दोष छिप गया। तुम भी इस दुर्घटना को भूल जाओ और मेरे साथ स्कूल चलो। सब तुम्हें बहुत याद करते हैं।'
       दुर्घटना के बहुत दिन बाद आज वह स्कूल गया था। शिक्षक व कक्षा के सभी छात्रों ने बड़े प्यार से उसका स्वागत किया था। सोनू भी हमेशा की तरह उससे बड़ी गर्मजोशी से मिला था लेकिन मदन सोनू से नजर नहीं मिला पा रहा था। वह स्वयं को शर्मिंदा महसूस कर रहा था। विकलांगता का दुख उसकी समझ में आ गया था। अब उसे दूसरे की तकलीफों का एहसास होने लगा था। बिना कुछ कहे उसने सोनू को गले से लगा लिया। दोनों की आँखों में आँसू थे।.
       

Email ---agarwalpavitra78@gmail.com
--