मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

विकलांगता का दुःख

बाल कहानी
         विकलांगता का दुःख
                                                              
                                                    पवित्रा अग्रवाल
 
        मदन ने जब आँखें खोलीं तो सामने पिता, माँ व दादी खड़े थे। उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई तो जगह  अनजानी लगी।
  "माँ मैं कहाँ हूँ ?'
  "बेटे, तुम अस्पताल में हो। कल स्कूल जाते समय तुम्हारी कार का एक्सीडेंट हो गया था।'
  "मेरी आँख पर यह पट्टी क्यों है ? हाथ पर भी प्लास्टर है। क्या हाथ की हड्डी टूट गई है ?'
  "हाँ बेटे, तुम्हारे हाथ की हड्डी टूट गई है। एक आँख में भी चोट लगी है।'
    आँख में चोट लगने की बात सुन कर मदन घबरा गया, "आँख में चोट ? माँ कहीं ऐसा तो नहीं कि इस एक आँख से अब मैं देख ही न पाऊँ ?'
  "ऐसा कुछ नहीं होगा। तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगे ।'
 मदन आँखें बंद करके लेट गया। उसे बहुत सी बातें याद आ रही थीं। पिछले वर्ष कक्षा में सोनू के  प्रथम आने पर उसने अपने मित्र अमित से कहा था, "यार, इस बार तो लँगड़े सोनू ने बाजी मार ली।'
    अमित को उसकी बात पसंद नहीं आई थी। उसने कहा था, "मदन, क्या तू खाली सोनू नहीं कह सकता। नाम से पहले लँगड़ा या ऐसा कोई भी विशेषण लगाना जरूरी है ? शर्म की बात है हमारे लिए कि शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के बाद भी पढ़ाई में उससे पीछे हैं।'
         "लँगड़ा है, इसीलिए तो प्रथम आ गया। न तो वह खेल सकता है और न कहीं ज्यादा आ जा सकता है। खाली बैठा क्या करे ... पढ़ता रहता होगा।...ज्यादा पढ़ेगा तो प्रथम तो आएगा ही।'
    अमित ने कहा, "मदन, ये सब फालतू के तर्क हैं। पता नहीं दूसरों की कमियाँ ढूँढ़ने में तुझे क्या मजा आता है। हमें दूसरों की अच्छाई देखनी चाहिए। दिलीप के हाथ में छह उँगली हैं तो तू उसे छंगा कहता है। मोहन को हकला कहता है। सुरेश को मोटा होने की वजह से हाथी कहता है। यह अच्छी बात नहीं है। शारीरिक दोष तो किसी में कभी भी आ सकता है।एक दुर्घटना में सोनू की टाँग कट गई थी तो वह लँगड़ा कर चलता है। तू किसी की शारीरिक कमी का मजाक उड़ाना छोड़ दे।'
        ये बातें याद करके मदन रोने लगा था । उसे लगा कि वह अब एक आँख से देख नहीं पाएगा।
        माँ-पापा यहाँ तक कि डॉक्टर ने भी उसे विश्वास दिलाया था कि वह ठीक हो जाएगा।
 लेकिन कुछ भी ठीक नहीं हुआ था। आँख में कार का शीशा चुभ गया था। डॉक्टर उसकी आँख नहीं बचा पाए। उसे एक कृत्रिम आँख लगा दी गई थी। वह अपने कमरे में बैठा रहता। सोचता रहता था कि नकली आँख देख कर बच्चे उसका मजाक उड़ाएँगे।
           माता-पिता ने उसे बहुत समझाया  लेकिन स्कूल भेजने में सफल नहीं हुए फिर अमित ने ही मदन को समझाया था और कहा था, "यह तुम्हारा भ्रम है। कोई मजाक नहीं उड़ाएगा। नवाब पटौदी की भी एक आँख दुर्घटना में खराब हो गई थी। उनकी भी कृत्रिम आँख लगी है। उसके बाद भी वह विज्ञापनों में काम कर रहे हैं और जहाँ तक मुझे याद पड़ता है बाद में भी वह क्रिकेट खेले हैं। उनकी योग्यता के सामने शारीरिक दोष छिप गया। तुम भी इस दुर्घटना को भूल जाओ और मेरे साथ स्कूल चलो। सब तुम्हें बहुत याद करते हैं।'
       दुर्घटना के बहुत दिन बाद आज वह स्कूल गया था। शिक्षक व कक्षा के सभी छात्रों ने बड़े प्यार से उसका स्वागत किया था। सोनू भी हमेशा की तरह उससे बड़ी गर्मजोशी से मिला था लेकिन मदन सोनू से नजर नहीं मिला पा रहा था। वह स्वयं को शर्मिंदा महसूस कर रहा था। विकलांगता का दुख उसकी समझ में आ गया था। अब उसे दूसरे की तकलीफों का एहसास होने लगा था। बिना कुछ कहे उसने सोनू को गले से लगा लिया। दोनों की आँखों में आँसू थे।.
       

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शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

गणेश चन्दा

बाल कहानी 
                       
गणेश चन्दा
                         
 पवित्रा  अग्रवाल

 "सोनम दरवाजे पर कौन था ?'
 " माँ गणेश का चन्दा मांगने के लिए चार पाँच लड़कों का ग्रुप आया  है।'
 " अरे हाँ अब गणेश चतुर्थी आ रही है यानि गणेश बैठाने के दिन, अब बच्चें दरवाजे की घन्टी बजा बजा कर परेशान करते रहेंगे ।'
  "आप कल जब घर पर नहीं थीं तब भी,तीन चार ग्रुप चन्दा माँगने आए थे।'
 "फिर तूने उन्हें चन्दा दिया ?"'
 "नहीं मम्मी आप घर पर नहीं थी ,मैं किसी को जानती नहीं  ... मैं ने तो दरवाजा भी नहीं खोला।'
 "अच्छा किया ।...हर गली,नुक्कड़ मे तीन चार गणेश बैठाते हैं। इस तरह अपने घर के आसपास कम से कम  छह- सात गणेश  लगेंगे । कुछ साल पहले एक बड़ा सा गणेश लगता था, सब वहीं पूजा कर लेते थे पर अब हर कोई अपने घर के सामने गणेश लगाने को तैयार बैठा है और हर किसी को चन्दा चाहिए। '
 "हाँ माँ अपने अपने गणेश अलग बैठाने का शौक है तो बैठाए, पर सब से चन्दा क्यों माँगते फिरते हैं ?...'
  "माँ वह लोग दरवाजे पर खड़े हैं,पहले उनसे बात करलो ।'
 "ठीक है अभी बात करती हूँ - " क्या बात है बच्चों, क्यों बैल बजा रहे हो ?'
 "आन्टी गणेश का चन्दा लेने आए हैं।'
 'अपने एरिये में बहुत वर्षो से इतना बड़ा गणेश लगता है, वह पूजा करने के लिए बस नहीं होता ?'
 "वहाँ बहुत भीड़ हो जाती है आन्टी फिर हम तो अपने घर के बाहर छोटा सा गणेश लगाते हैं,अच्छी तरह पूजा करने को भी मिल जाती है।'
 "क्या तुम लोग स्कूल नहीं जाते हो ?'
" जाते हैं न आन्टी, मैं नौ क्लास में पढ़ता हूँ, यह सब भी ऐसे ही अलग अलग कक्षाओं में पढ़ते हैं'
 "जो समय तुम इस काम में व्यर्थ  कर रहे हो वह समय तुम्हें अच्छे से पढ़ने लिखने में लगाना चाहिए।'
 "आन्टी गणेश इसी लिए तो बैठा रहे हैं ताकि अच्छे से पूजा कर सकें और वह हमें आशीर्वाद दें।'
 "यदि तुम बड़े गणेश की पूजा करोगे  या किसी दूसरे गणेश मंदिर में जा कर पूजा करोगे तो क्या भगवान तुम्हें आशीर्वाद नहीं देंगे ?'
 "देंगे पर इस से ज्यादा खुश होंगे , प्लीज आन्टी दीजिए न यह तो धर्म का काम है ।'
 "हाँ बेटा धर्म का काम है और हम हर वर्ष बड़े गणेश को बड़ा चन्दा देते हैं और पूजा करने के लिए एक  गणेश बहुत हैं, तुम लोगों को भी उन्हीं की पूजा करनी चाहिए ...हम ज्यादा गणेश बैठाने के पक्ष में नहीं हैं । '
 "पर क्यों आन्टी ?'
 "हाँ बच्चों इस विषय में तुम्हें मैं जरूर बताना चाहूँगी। गणेश प्रतिमाए क्या मुफ्त में मिलती है ?।
 "आन्टी मुफ्त में मिलतीं तो हम चन्दा क्यों माँगते,बहुत मंहगी मिलती हैं और बड़े गणेश तो सुना हैं साइज के हिसाब  से पचास साठ हजार तक आते हैं ?'
 "बेटा एक बात बताओ ...अपने शहर में कितने गणेश बिठाए जाते होंगे ? '                
 "कम से कम सात हजार ..और हर वर्ष इनकी संख्या बढ़ती जा रही है।'
  "यानि करोड़ों रुपए के गणेश लिए जाते हैं और  कुछ दिन पूजा के बाद उनको नदी ,तालाबों में डाल कर जल को प्रदूषित किया जाता है ... और यह हिसाब तो एक शहर का है, पूरे देश में कितना धन इस पर खर्च होता होगा ? और यह तो सिर्फ प्रतिमाओं की कीमत है...बाकी सब अलग ..बेटा तुम बताओ आज कितने बच्चें धन के अभाव में स्कूल नहीं जा पाते, ऊँची पढाई नहीं कर पाते ।'
 "हाँ आन्टी बहुत से तो पढ़ाई की उम्र तक ही नहीं पहुँच पाते... उस से पहले ही भूख और बीमारी के
शिकार हो कर मर जाते हैं।'
 " बेटा मैं बस तुम लोगों को यही बताना चाह रही थी ...यह पैसा सही जगह लगे तो कितनों का भला हो सकता है।'
 "पर आन्टी एक दो के न लगाने से क्या फर्क पड़ना है ?'
      "बेटा लोगों को जागरूक करना पड़ेगा।हम जैसे लोग चन्दा माँगने वालों को चन्दा न देकर उन्हें न देने की वजह बताऐ। मीडिया समाचार पत्रों व टी वी चैनलों के माघ्यम से इस तरह के संदेश  प्रसारित हों तो धीरे धीरे ही सही जरूर जागृति आएगी ।'
 "हाँ आन्टी हम ने इस तरह से कभी सोचा ही नहीं और किसी ने इस तरह से हमें समझाया भी नहीं ।'
 "हाँ आन्टी अब बात हमारी समझ में आ गई है। हम अब से बड़े गणेश की ही पूजा करेंगे और दूसरे लोगो को भी समझाने की कोशिश करेंगे ।'
 "थैंक्यू आन्टी हमारा मार्गदर्शन करने के लिए ।'              



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बुधवार, 9 अगस्त 2017

पानी के बताशे

बाल कहानी
                        पानी के बताशे
       
                                                   पवित्रा अग्रवाल


      ट्यूशन पढ़ कर लौटते हुए शालिनी की नजर चाट के ठेले पर पड़ी। गोल गप्पे देख कर उस के मुंह में पानी भर आया।उसने अपनी सहेली से कहा -- "रोहिणी देख सामने की बंडी पर पानी के बताशे मिल रहे हैं ।''
  "तुम इन्हें पानी के बताशे बोलती हो, हम इन्हें गोल गप्पे कहते हैं।''
     "हाँ कुछ लोग पानी पुड़ी भी बोलते हैं पर यार है बड़े मजे की चीज।इन्हें देख कर तो मेरे मुंह में पानी   आ रहा है,चल खाते हैं।''
  "नहीं शालिनी मैं बाहर के गोल गप्पे कभी नहीं खाती ।मेरी मम्मी ने कभी खाने ही नहीं दिए। सब से   ज्यादा इंफैक्शन की जड़ हैं ये ।''
     "वो कैसे ?''
  "देख शालिनी आज कल पीने का पानी कितना गंदा आ रहा है।अपने घरों में एक्वागार्ड या इसी तरह की पानी साफ करने की कोई न कोई मशीन लगी है।... पर इनके पानी का कोई भरोसा नहीं है।''
 " हाँ सो तो है।''
 " देख जिन हाथों से ये रुपए पैसे लेते हैं, उन्ही हाथों से यह चाट बना रहे हैं...इन्ही से घड़े में हाथ डुबो कर बताशों में पानी भर भर कर लोगों कों खिलाते भी जा रहे हैं।इस तरह हाथ की सारी गंदगी उस   पानी में घुलती जाती है।''
  "हाँ रोहिणी बात तो तूने बिलकुल सच कही है पर यह रूपए पैसे वाली बात मेरी समझ में नहीं आई।''
 "ये रुपए पैसे सैंकड़ों लोगों के हाथ से गुजरते हैं।जैसे हम खाँसते या छींकते समय मुंह पर हाथ रखते  हैं, हाथ गंदे हो गए न,सफाई कर्मचारी कचरा उठा रहा है किसी ने रूपए दिए तो उन्हीं हाथों से ले कर उसने जेब में रख लिए ... कहने मतलब यह है कि  रूपए पैसे लेते देते समय हाथों की गंदगी रुपयों में लगती रहती है और रुपयों की यात्रा जारी रहती है । ''   
  "ओ हाँ रोहिणी रुपए पैसे तो वाकई गंदे होते हैं। यह गंदगी भी हाथों द्वारा पानी में घुल जाती होगी । छी, अब तो मैं बाहर पानी के बताशे कभी भी नहीं खाऊंगी।...पर ये मुझे बहुत पसंद हैं तुझे अच्छे नहीं  लगते ?'
     "अच्छे क्यों नहीं लगते शालिनी, मुझे भी बहुत पसंद हैं ।मैं खाती भी हूँ पर घर पर ।...आजकल तो बाजार में गोल गप्पों का पैकेट मिलता है,पापा वही ले आते हैं।मम्मी आलू ओर मटरा उबाल लेती हैं और पानी भी घर में ही बना लेती हैं ।इस तरह हम लोग तो अक्सर घर में खाते ही रहते हैं ।''
  "पर बाहर का पानी बहुत मजेदार होता है ,वैसा घर में नहीं बन पाता होगा ।''
  " "घर में भी अच्छा बन जाता है,मम्मी तो धनियां ,पोधीना जाने क्या क्या डाल कर बनाती हैं,सब मसालों  का खेल है। वैसे बाजार में पानी पुड़ी मसाले का पैकेट भी आता है।...पर सब से खास बात शालिनी  यह है कि स्वाद के चक्कर में हम स्वास्थ्य से खिलवाड़ तो नहीं कर सकते न ।''
  "बिलकुल ठीक कहा तूने रोहिणी ,स्वास्थ्य से खिलवाड़ का मतलब है ...डाक्टर्स के चक्कर लगाओ, दवाएं खाओ।... मतलब समय व धन दोनो की बरबादी।''
  "देख शालिनी सामने की दुकान पर गोल गप्पों का पैकेट मिल रहा है।चल लेते हैं साथ ही इसके मसाले का पैकेट भी ले लेंगे ।''
 "पर पानी कौन बनाएगा ?''
 "शालिनी,पहले मेरे घर चल मम्मी से पानी  बनवा लेंगे,तू भी देख लेना कैसे बनता है।..हमारी फ्रिज में हमेशा कुछ उबले आलू जरूर रहते हैं।...अब तू गोल गप्पे खा कर ही जाना और हाँ हमारे घर से अपनी मम्मी को फोन कर देना...वरना वह चिन्ता करेंगी।''
   "अरे मेरे मुंह में तो फिर पानी आने लगा '' दोनो हँसती हैं
      

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सोमवार, 10 जुलाई 2017

नया विश्वास

बाल कहानी 
                       नया विश्वास
                              
              


                                             पवित्रा अग्रवाल

   रजनी आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। कक्षा में वह प्रथम तो कभी नहीं आई किन्तु हमेशा प्रथम दस में रहती थी। नृत्य, नाटक, डिवेट आदि में हमेशा भाग लेती थी और पुरस्कार भी पाती थी। नृत्य का प्रशिक्षण तो वह तीन-चार वर्ष की उम्र से ले रही थी। कत्थक नृत्य में वह प्रवीण हो चुकी थी। नृत्य के कई स्टेज प्रोग्राम दे चुकी थी। पढ़ने में उसकी रुचि  थी।  वह स्नातक की डिग्री तो लेना चाहती थी किन्तु नृत्य व अभिनय को अपना कैरियर बनाना चाहती थी। उसका बाल मन भविष्य के सपने देखने लगा था।
  एक दिन पैदल स्कूल जा रही थी । सड़क पार करते समय वह एक बस से टकरा गई। बस का पहिया उसके पैर पर से उतर गया था। घुटने से नीचे का एक पैर डॉक्टर को काटना पड़ा था।....इस दुर्घटना में उसकी टाँग ही नहीं गई बल्कि सब सपने भी टूट कर बिखर गए थे। माता-पिता के बहुत समझाने पर भी वह स्कूल नहीं जा रही थी। उसने अपने घुँघरू उठा कर खिड़की से बाहर फेंक दिये थे। दिन भर अपने कमरे में उदास सी बैठी रहती थी। स्वभाव से चिड़चिड़ी हो गई थी ।
 उन्हीं दिनों उसके शहर में फिल्मी सितारों का एक ग्रुप आया था जो नृत्य का स्टेज प्रोग्राम देने वाला था। माता-पिता जिद्द करके रजनी को भी उस प्रोग्राम में ले गए।
 एक नृत्यांगना को देख कर वह चहकी- "मम्मी ये तो सुधा चन्द्रन है। ये टी.वी. के बहुत से सीरियल्स में काम कर रही है।'
 पापा ने कहा, "तुम ने सही पहचाना, ये सुधा चन्द्रन ही है। तुम्हें इनका नृत्य कैसा लगा ?'
 "बहुत अच्छा लगा पापा' कह कर वह फिर उदास हो गई। उसे नृत्यांगना व अभिनेत्री बनने का अपना सपना फिर याद आ गया था। उसकी आँखें भर आई। उसके सपने मात्र स्वप्न बन कर ही रह गए थे जो अब कभी पूरे नहीं हो पाएँगे। वह अपाहिज की जिन्दगी जीते हुए यों ही एक दिन दुनिया से चली जाएगी।
 तभी उसे माँ का स्वर सुनाई दिया-- "रजनी क्या सुधा की तरह तुम नृत्य नहीं कर सकती ?'
 रजनी ने लाचारी से एक बार अपनी टाँग को देखा फिर कहा, "मम्मी आप जानती हैं मैं कभी नृत्य नहीं कर सकती फिर भी आप यह प्रश्न पूछ कर क्या मेरा मजाक उड़ा रही हैं ?'
 "कैसी बातें करती हो रजनी ... मैं माँ होकर तुम्हारा मजाक उड़ाऊँगी ? शायद तुम्हे पता नहीं कि इस नृत्यांगना सुधा की भी एक टाँग दुर्घटना में कट गई थी। यह नकली पैर से नृत्य कर रही है यदि यह नृत्य व अभिनय कर सकती है तो तुम क्यों नहीं कर सकती ?'
     ये आप क्या कह रही है माँ, मुझे विश्वास नहीं होता। बचपन में मैंने एक फिल्म देखी थी उसमें फिल्म की हीरोइन ने नकली पैर से नृत्य किया था....लेकिन वह तो फिल्मों की बातें है।.....वास्तविक जीवन में ये सब कहाँ हो पाता है।"
 "अरे उसकी हीरोइन यही सुधा तो थी। उस फिल्म का नाम था " नाचे मयूरी'...वह फिल्म सुधा के वास्तविक जीवन पर ही बनी थी।....'
 "सच माँ... मुझे ये नहीं मालूम था। ये फिल्म मुझे फिर से दिखाना।...पापा मैं सुधा चन्द्रन से मिलना चाहती हूँ।'
     "ठीक है बेटा मैं उनसे बात करके तुझे मिलवाने की व्यवस्था करता हूँ।'
 प्रोग्राम के बाद में रजनी सुधा के साथ थी।
 सुधा ने संक्षेप में रजनी को अपनी आत्मकथा सुनाई कि किस  तरह   वह भी निराश हो गई थी। उसके माता-पिता ने जयपुर ले जाकर  नकली पैर लगवाया था। धीरे-धीरे डाँस की प्रैक्टिस प्रारंभ की।...इस बीच कई बार निराशाओं ने घेरा। अंत में मैं ने अपंगता पर विजय पा ली है यह तो तुमने देख ही लिया है।...रजनी तुम भी निराश मत हो, हिम्मत से काम लो। इच्छा शक्ति को दृढ़ करो। हीनता की भावना को अपने पास भी मत फटकने दो। अपना एक लक्ष्य निर्धारित करो फिर उस दिशा में प्रयास प्रारंभ कर दो सफलता जरूर मिलेगी।'
  " आपसे मिलकर मुझ में एक नए विश्वास ने जन्म लिया है। अब मैं जीवन से उतनी निराश नहीं हूँ।'
 रजनी ने पुन: स्कूल जाने का निर्णय कर लिया। जल्दी ही वह पापा-मम्मी के साथ कृत्रिम पैर लगवाने जयपुर जाएगी। उसने निश्चय कर लिया है कि वह भी जीवन में कुछ पाकर  रहेगी

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मेरे ब्लोग्स

गुरुवार, 8 जून 2017

लगाम जरुरी



बाल कहानी                      
                    लगाम  जरूरी

                                                         पवित्रा अग्रवाल

     कालेज में कक्षाएं शुरू हो चुकी थीं। अपने प्रिय मित्र संयम को न देख कर प्राण और हीमेश को कुछ चिन्ता होने लगी ।
  प्राण ने कहा -- "परीक्षाओ के दिन हैं ,इन दिनों तो सब बच्चों पर तैयारी का भूत सवार रहता है पर संयम क्यों नहीं आया ।...किसी से पता करना होगा ।'
 "संयम राहुल के घर के पास  ही रहता है। यह क्लास समाप्त होने पर राहुल के पास चल कर पूछते हैं।'
      " हाँ याद आया ,दोनो एक ही अपार्टमेंन्ट में रहते हैं , शायद उसको कुछ जानकारी हो ।'
शिक्षक के जाते ही प्राण और हीमेश कक्षा से बाहर आए तो राहुल सामने ही खड़ा मिल गया।
 "राहुल आज संयम कालेज क्यों नहीं आया ?'
   "तुम्हें नहीं पता ?...  संयम के बहुत चोट आई है, इस समय वह अस्पताल में है।'
 "उसे चोट कैसे लगी ,कहीं गिर गया था क्या ?'
 "अरे नहीं, वह रात को अपने किसी दोस्त के यहाँ से बाइक पर लौट रहा था, सामने से आती किसी कार से टक्कर  हो गई थी, तो वह गिर पड़ा... सब से अधिक चोट सिर में लगी है...अभी वह बेहोश है और उसकी हालत चिन्ताजनक है।'
 "बाइक पर वह अकेला था ? '
 "नहीं साथ में उसका कजिन भी था ।'
 "उसको चोट नहीं आई ?'
 "वह बच गया , पर उसके हाथ की  हड्डी टूटी है ।'
 "निश्चित रूप से उसने हैलमेट नहीं लगा रखा होगा ।'
 "हाँ तुम्हारा अनुमान बिलकुल सही है ....डाक्टर्स भी यही कह रहे थे कि यदि उसने हैलमेट लगा रखा होता तो वह सिर की चोट से बच सकता था। पुलिस भी आ गई थी...संयम के पास लाइसेंन्स भी नहीं था।'
 "हमारे बराबर का ही तो है, इस उम्र में लाइसेंन्स बन ही नहीं सकता। उसके बाइक लेने के बाद मैं ने भी घर में जिद्द की थी कि मुझे भी बाइक दिला दो...पर मम्मी पापा ने सख्ती से मना कर दिया ।...बोले अभी तुम्हें अठारह साल का होने में एक वर्ष है, उस से पहले तुम्हें न तो लाइसेन्स मिलेगा और ना बाइक ।'
...मैं ने  उन्हें बताया कि हमारे साथ के कई लड़के बाइक पर आते हैं और उनके पास लाइसेन्स भी है।'
   पापा ने कहा - "उन लोगों ने उम्र गलत बता कर लाइसेंन्स ले लिया होगा...जो कि सही नहीं है।पापा बड़बड़ाए थे कि पता नहीं कैसे माँ बाप हैं जो बच्चों की गलत जिद्द को पूरा करने के लिए इस तरह झूठ का सहारा लेते हैं...
  मम्मी ने भी पापा की बात को सही ठहराते हुए कहा था - " बच्चों को झूठ और बेइमानी का पाठ तो वही पढ़ा रहे हैं।'
 "हाँ तुम्हारे मम्मी पापा ने ठीक कहा था।...मैं तो अठारह का हो चुका हूँ ...मेरे पास लाइसेंन्स भी है और घर पर बाइक भी।... फिर भी मुझे कालेज बाइक से आने की छूट नहीं है ।कभी बाइक से जाता भी हूँ तो हैलमेंट लगाने की शर्त पर ही बाइक दी जाती है...साथ ही चेतावनी भी कि किसी दिन तुम को बिना हैलमेट के बाइक चलाते देख लिया तो उसके बाद तुम्हें बाइक नहीं दी जाएगी।'
"हाँ राहुल हमें इस तरह का अनुशासन बुरा तो लगता है पर वह हमारे भले के लिए ही ऐसा करते हैं।'
 राहुल ने पुन: कहा -"सुना है कि कार चलाने बाला बच्चा भी कम उम्र का था।....लोगों ने कार का नंबर नोट कर लिया है।...एक दो दिन में पकड़ कर उस पर भी कार्य वाही होगी।'
  "ऐसे लोगों के साथ ट्रेफिक पुलिस वालों को भी सख्ती बरतनी चाहिए ।'
 " हाँ यार लगाम तो लगानी चाहिए । ...देख वो हमारी मैडम क्लास लेने आ रही हैं,हम चलते हैं ...शाम को संयम को देखने अस्पताल चलेंगे ।'
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-पवित्रा अग्रवाल